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शांति नोबेल 2026: भारतीय मूल की नावी पिल्लै को इनाम

By Gagariya Editorial Desk•9 Oct 2026 IST•6 min read•Human Reviewed & Fact-Checked
शांति नोबेल 2026: भारतीय मूल की नावी पिल्लै को इनाम
Photo: Own or licensed by the publisher

ओस्लो की शुक्रवार की घोषणा

नॉर्वे की नोबेल समिति के अध्यक्ष यॉर्गेन वात्ने फ्रायडनेस ने शुक्रवार को ओस्लो में नाम पढ़ा: नवानेथम 'नावी' पिल्लै। दक्षिण अफ्रीका की इस 85 वर्षीय विधिवेत्ता को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार 'शांति और अंतरराष्ट्रीय क़ानून को बढ़ावा देने के उनके प्रयासों' के लिए दिया गया है। समिति ने अपने प्रशस्ति-पत्र में कहा कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून की व्यवस्था इस समय 'भारी दबाव में है और इसके संस्थान हमले झेल रहे हैं'। 'जब ताक़त क़ानून पर हावी होती है, तो स्थिरता, भरोसा और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व कमज़ोर पड़ता है', समिति ने लिखा। यह पुरस्कार 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर (लगभग 12 लाख अमेरिकी डॉलर) का है और 10 दिसंबर को ओस्लो में दिया जाएगा।

मंडेला की वकील से विश्व न्यायालयों की जज तक

1941 में डरबन में, रंगभेद के दौर में जन्मी पिल्लै दक्षिण अफ्रीका में अपना लॉ फर्म खोलने वाली पहली अश्वेत महिला बनीं। उन्होंने नैल्सन मंडेला और रंगभेद के ख़िलाफ़ खड़े अन्य कार्यकर्ताओं की बचाव वकील के रूप में काम किया और रॉबेन द्वीप के राजनीतिक कैदियों के अधिकार दिलाने में भूमिका निभाई। बाद में वे दक्षिण अफ्रीका के हाई कोर्ट की पहली अश्वेत महिला जज बनीं।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर उनका सफ़र और लंबा है: रवांडा ट्रिब्यूनल की जज और फिर उसकी अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय (आईसीसी) की जज, और 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त। पिछले साल उन्होंने कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्र पर संयुक्त राष्ट्र जांच आयोग की अध्यक्षता की, जिसकी रिपोर्ट में कहा गया कि इसराइल ने गाज़ा में नरसंहार किया है। इसराइल ने उस रिपोर्ट को 'शर्मनाक' बताकर खारिज कर दिया था। द टाइम्स के अनुसार पिल्लै फिलहाल म्यांमार के ख़िलाफ़ द गाम्बिया के मुक़दमे में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) की एड-हॉक जज हैं, जो रोहिंग्या समुदाय पर कथित नरसंहार से जुड़ा है। वे पांचवीं दक्षिण अफ्रीकी नोबेल शांति विजेता हैं। उनसे पहले अल्बर्ट लूथुली (1960), आर्कबिशप डेसमंड टूटू (1984) और नैल्सन मंडेला व एफडब्ल्यू डे क्लर्क (1993) यह सम्मान पा चुके हैं।

नटाल की चीनी मिलों से शुरू हुई कहानी

पिल्लै का भारत से रिश्ता सिर्फ़ मूल का नहीं, पारिवारिक इतिहास का है। 1890 के दशक में उनके दादा-दादी अनुबंधित मज़दूर बनकर नटाल की चीनी बागानों में काम करने गए थे। सैम नायडू की जीवनी 'नावी पिल्लै: रियलाइज़िंग ह्यूमन राइट्स फॉर ऑल' के अनुसार वे आठ भाई-बहनों में पांचवीं थीं और उनके पिता बस चलाते थे। घर में तंगी थी।

उस दौर में 1860 से 1911 के बीच क़रीब 1,50,000 भारतीय मज़दूर ब्रिटिश उपनिवेश नटाल लाए गए थे, जिनमें ज़्यादातर तमिलनाडु, बिहार, उत्तर प्रदेश और गुजरात से थे। बागानों में हालात क्रूर थे, जिन्हें गुलामी जैसा बताया जाता है। पिल्लै अक्सर ख़ुद को 'दुनिया भर के पीड़ितों की आवाज़' कहती हैं। दिलचस्प यह कि जिस दिन उनका नाम घोषित हुआ, उसी दिन भारत के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के 'इंडेंचर्ड सर्वेंट्स' वाले शब्द पर आपत्ति जताई। वेंस ने एच-1बी वीज़ा धारकों के लिए यह शब्द इस्तेमाल किया था, जिसे मंत्रालय ने 'अनुचित' बताया और कहा कि यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारतीय पेशेवरों के योगदान को नज़रअंदाज़ करता है।

'थोड़ी और ताली बजाइए, तो ट्रम्प के साथ बाँट दूँ'

घोषणा के फ़ौरन बाद पिल्लै की एक टिप्पणी सुर्खियों में आई। वे न्यूरेम्बर्ग के उसी अदालत-भवन में थीं, जहाँ कभी नाज़ी नेताओं पर मुक़दमा चला था और जहाँ वे इंटरनेशनल न्यूरेम्बर्ग प्रिंसिपल्स अकादमी की सलाहकार परिषद की अध्यक्ष हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल की महासचिव एग्नेस कैलामार्ड ने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट किया, जिसमें ताली बजाते सहकर्मियों के बीच पिल्लै ने हंसते हुए कहा, 'अगर आप थोड़ी और ताली बजाएंगे, तो शायद मैं यह पुरस्कार ट्रम्प के साथ बाँट दूँ।'

यह मज़ाक अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प की नोबेल की लंबे समय से चली आ रही चाहत पर था। ट्रम्प ने कई बार खुलेआम कहा है कि वे इस पुरस्कार के हक़दार हैं। घोषणा से कुछ घंटे पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि पाकिस्तान ने ट्रम्प को नोबेल के लिए नामित किया था और उम्मीद है कि 'इस बार' उनके प्रयासों को मान्यता मिलेगी। शरीफ़ के अनुसार ट्रम्प ने भारत-पाकिस्तान को 'युद्ध के कगार से वापस लाने में ऐतिहासिक भूमिका' निभाई।

नई दिल्ली इसे साफ़ नकारती रही है। भारत का कहना है कि मई 2025 में कश्मीर में आतंकी हमले के बाद शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद 10 मई 2025 को हुआ युद्धविराम सीधी बातचीत से हुआ था और इसमें किसी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं थी। 13 मई 2025 को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने यही कहा था, और विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने बताया था कि प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रम्प को फ़ोन पर साफ़ कहा था कि भारत कभी मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेगा। एनडीटीवी के अनुसार ट्रम्प मई 2025 से अब तक यह दावा क़रीब 80 बार दोहरा चुके हैं। कंबोडिया और इसराइल के नेताओं ने भी ट्रम्प को नामित करने की बात कही थी। इस साल कुल 287 नामांकन दर्ज हुए थे, जिनमें 208 व्यक्ति और 79 संगठन शामिल थे। जनवरी में 2025 की विजेता वेनेज़ुएला की नेता मारिया कोरिना मचाडो ने व्हाइट हाउस में ट्रम्प को अपना मेडल दे दिया था, लेकिन नोबेल समिति का कहना है कि एक बार दिया गया पुरस्कार बांटा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।

उसी दिन: वाशिंगटन ने आईसीसी पर ठोके प्रतिबंध

घोषणा के कुछ ही घंटों बाद ट्रम्प प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय पर नए प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने बयान में कहा कि राष्ट्रपति ट्रम्प 'आईसीसी को अमेरिकियों पर मुक़दमा चलाने की इजाज़त कभी नहीं देंगे'। उन्होंने कहा, 'हम इस दुष्ट अदालत के साथ लेन-देन पर रोक लगाएंगे, इसके संसाधन काटेंगे और इसे काम करने के लायक़ नहीं छोड़ेंगे।' अमेरिका पहले भी इस अदालत पर दबाव बनाता रहा है: एक तरफ़ गाज़ा को लेकर इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू के ख़िलाफ़ गिरफ़्तारी वारंट और दूसरी तरफ़ अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की जांच। पिछले महीने ट्रम्प ने देशों से आईसीसी छोड़ने का आह्वान भी किया था।

इसराइल की प्रतिक्रिया तीखी रही। नेतन्याहू के कार्यालय ने सोशल मीडिया पर पिल्लै को 'धर्मांध' कहा और आरोप लगाया कि वे 'यहूदियों के अपमान' को बढ़ावा देती हैं। इसराइल के विदेश मंत्रालय ने इसे 'पुरस्कार का घिनौना राजनीतिकरण' बताया और कहा कि झूठ के लिए पुरस्कार होता तो पिल्लै सबसे आगे होतीं। आईसीसी ने जवाब में कहा कि ये क़दम अंतरराष्ट्रीय क़ानून पर हमला हैं और 'इतिहास इस पल का फ़ैसला करेगा'। ब्रिटेन समेत आईसीसी के आठ सदस्य देशों, कनाडा, जर्मनी, डेनमार्क, फ्रांस, इटली, जापान और नीदरलैंड, ने प्रतिबंधों पर अफ़सोस जताया और अदालत की स्वतंत्रता के समर्थन का ऐलान किया।

2026 के पाँचों नोबेल: अब तक के विजेता

पुरस्कार विजेता काम
चिकित्सा तीन वैज्ञानिक दिमाग़ के 'लाइट स्विच' की खोज
भौतिकी फ्रांसिस हैल्ज़न आइसक्यूब वेधशाला से न्यूट्रिनो अनुसंधान
रसायन कागन और सोआई अणुओं की संरचना की पहेली सुलझाना
साहित्य ऐनी कार्सन कविता और प्राचीन यूनानी ग्रंथों का काम
शांति नावी पिल्लै शांति और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का प्रचार

आगे क्या

पुरस्कार वितरण 10 दिसंबर को ओस्लो में होगा, लेकिन बहस पहले से शुरू हो चुकी है। एक ओर नोबेल समिति ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून के संस्थानों पर हमले के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका ने उसी दिन आईसीसी पर प्रतिबंध लगाकर जवाब दे दिया। पिल्लै की अध्यक्षता वाली वह गाज़ा रिपोर्ट, जिसे इसराइल ने ख़ारिज किया था, अब और केंद्र में आ जाएगी। यह पुरस्कार कानूनी संस्थानों की ताक़त बढ़ाएगा या राजनीतिक टकराव का एक और मोर्चा बनेगा, यह आने वाले हफ़्तों में साफ़ होगा।

Questions people ask

नावी पिल्लै कौन हैं?
नावी पिल्लै दक्षिण अफ्रीका की 85 वर्षीय विधिवेत्ता हैं, जिनका परिवार भारतीय तमिल मूल का है। वे रंगभेद-विरोधी वकील रहीं, रवांडा ट्रिब्यूनल और आईसीसी की जज बनीं, और 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त रहीं। उन्हें 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय क़ानून को बढ़ावा देने के लिए मिला है।
नोबेल शांति पुरस्कार 2026 उन्हें क्यों दिया गया?
नॉर्वे की नोबेल समिति ने पिल्लै को 'शांति और अंतरराष्ट्रीय क़ानून को बढ़ावा देने के प्रयासों' के लिए चुना। समिति ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून की व्यवस्था भारी दबाव में है, और पिल्लै ने युद्ध अपराधों व नरसंहार जैसे गंभीर मामलों में जवाबदेही के लिए संस्थानों को मज़बूत करने में भूमिका निभाई है।
पिल्लै का भारत से क्या रिश्ता है?
पिल्लै का परिवार भारतीय तमिल मूल का है। 1890 के दशक में उनके दादा-दादी अनुबंधित मज़दूर बनकर दक्षिण अफ्रीका के नटाल प्रांत की चीनी बागानों में काम करने गए थे। 1941 में नटाल में जन्मी पिल्लै आठ भाई-बहनों में पांचवीं थीं और उनके पिता बस चलाते थे। वे ख़ुद को पीड़ितों की आवाज़ कहती हैं।
ट्रम्प को नोबेल क्यों नहीं मिला?
ट्रम्प ने खुलेआम कहा था कि वे पुरस्कार के हक़दार हैं और पाकिस्तान, कंबोडिया व इसराइल के नेताओं ने उन्हें नामित किया था। लेकिन नोबेल समिति ने पिल्लै को चुना। जनवरी में 2025 की विजेता मारिया कोरिना मचाडो ने ट्रम्प को अपना मेडल दिया था, पर समिति कहती है कि दिया गया पुरस्कार बांटा या हस्तांतरित नहीं हो सकता।
पुरस्कार कब और कहाँ दिया जाएगा?
2026 का नोबेल शांति पुरस्कार 10 दिसंबर को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में दिया जाएगा। यही अल्फ्रेड नोबेल की पुण्यतिथि की तारीख़ है, जब हर साल शांति पुरस्कार का समारोह होता है। पुरस्कार की राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर है, यानी लगभग 12 लाख अमेरिकी डॉलर।

Sources

  1. The Times: South African lawyer Navi Pillay wins 2026 Nobel peace prize (thetimes.com)
  2. NDTV: Shehbaz Sharif offers Nobel hope for Trump, Navi Pillay cracks a joke (ndtv.com)
  3. NDTV: Navi Pillay's Nobel win carries family story that began on a sugar plantation (ndtv.com)
  4. USA Today: US sanctions the ICC after former judge wins the Nobel Peace Prize (usatoday.com)
  5. Gagariya: Nobel Medicine 2026 report (other-prize table) (gagariya.com)
  6. Gagariya: Nobel Physics 2026 report (other-prize table) (gagariya.com)
  7. Gagariya: Nobel Chemistry 2026 report (other-prize table) (gagariya.com)
  8. Gagariya: Nobel Literature 2026 report (other-prize table) (gagariya.com)

Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.

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