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भौतिकी नोबेल 2026: फ्रांसिस हैल्ज़न को आइसक्यूब का इनाम

By Gagariya Editorial Desk•7 Oct 2026 IST•5 min read•Human Reviewed & Fact-Checked
भौतिकी नोबेल 2026: फ्रांसिस हैल्ज़न को आइसक्यूब का इनाम
Photo: Own or licensed by the publisher

82 वर्षीय फ्रांसिस हैल्ज़न ने फोन पर नोबेल समिति से कहा, यह पूरी तरह अप्रत्याशित था। उस समय वह इटली में थे, और उनकी बातचीत ऐलान के प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुनाई गई। कुछ देर पहले ही रॉयल स्वीडिश अकादमी ऑफ साइंसेज ने स्टॉकहोम में 2026 के भौतिकी नोबेल पुरस्कार का ऐलान किया था। विजेता: सिर्फ एक नाम। फ्रांसिस हैल्ज़न।

सम्मान उन्हें आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला के निर्माण में निर्णायक योगदान और खगोलीय मूल के उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो की खोज के लिए दिया गया है। सरल शब्दों में, उन्होंने अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे एक विशाल यंत्र खड़ा किया, जिसने अंतरिक्ष से आने वाले सबसे रहस्यमयी कणों को पकड़कर खगोलशास्त्र का नया दरवाजा खोल दिया।

ये 'भूतिया कण' आखिर हैं क्या

न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के सबसे जिद्दी कणों में गिने जाते हैं। अल जज़ीरा के मुताबिक, इनमें लगभग द्रव्यमान नहीं होता और न ही विद्युत आवेश। यही वजह है कि ये ग्रहों, तारों और इंसानी शरीर के आर-पार निकल जाते हैं। हर पल खरबों न्यूट्रिनो पृथ्वी के बीच से गुजर रहे होते हैं। अल जज़ीरा का कहना है कि हर सेकंड करीब 100 ट्रिलियन सूर्यज और ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो हमारे शरीर के आर-पार होते हैं।

इसी अदृश्यता के कारण वैज्ञानिक इन्हें 'भूतिया कण' कहते हैं। द हिंदू के अनुसार, ये बिंदु जैसे कण हैं, जिनका न मापने योग्य आकार है, न विद्युत आवेश। इसलिए ये परमाणुओं से टकराते ही नहीं। अगर परमाणु को गिरजाघर मानें, तो उसका नाभिक मक्खी जितना छोटा है। न्यूट्रिनो उसमें से भी आसानी से निकल जाते हैं।

जब कभी कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु के नाभिक से टकराता है, तो आवेशित कण पैदा होते हैं जो हल्की नीली रोशनी की चमक छोड़ते हैं। द हिंदू के मुताबिक, इसी चमक को चेरेनकोव प्रकाश कहते हैं। यही वह संकेत है जिसे आइसक्यूब पकड़ता है। इन दुर्लभ टकरावों से वैज्ञानिक यह पता करते हैं कि उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो किन हिंसक प्रक्रियाओं में पैदा होते हैं।

बर्फ में गड़ा एक घन किलोमीटर

द हिंदू के अनुसार, आइसक्यूब एक घन किलोमीटर बर्फ को घेरे हुए है, जो लगभग 91.7 करोड़ लीटर पानी के बराबर है। इसमें 5,160 ऑप्टिकल सेंसर लगे हैं और इसका निर्माण 2010 में पूरा हुआ था। न्यू साइंटिस्ट के मुताबिक, यह 450 से ज्यादा लोगों, 58 संस्थानों और 14 देशों के अंतरराष्ट्रीय सहयोग से बना है।

दक्षिणी ध्रुव की बर्फ इस प्रयोग के लिए आदर्श मानी गई। द हिंदू के अनुसार, वहां कई तरह के व्यवधान नहीं होते और इलाका भूवैज्ञानिक रूप से स्थिर है, जहां भूकंपीय गतिविधि बहुत कम है। न्यू साइंटिस्ट के मुताबिक, गर्म पानी से गहरे छेद करके सेंसर करीब दो किलोमीटर नीचे बिछाए गए। जब न्यूट्रिनो पृथ्वी के आर-पार जाते हैं और बर्फ से टकराते हैं, तो नीली रोशनी निकलती है। सेंसरों का जाल उस रोशनी से कण की दिशा पता करता है और उसका स्रोत खोजता है।

नोबेल समिति के अध्यक्ष मार्क पियर्स ने एक बयान में कहा कि हैल्ज़न की दृढ़ता और वैज्ञानिक दृष्टि ने एक नए तरह के खगोलशास्त्र की राह खोली है। समिति की सदस्य ईवा ओल्सन ने ऐलान के समय कहा कि ये कण ब्रह्मांड से सूचना लाने वाले दूत हैं। उन्होंने कहा कि इस वेधशाला ने दूरस्थ आकाशगंगाओं का दरवाजा खोला और तारों के विस्फोट की प्रक्रियाओं के बारे में बताया।

1988 से 2026 तक

  1. 1988 में हैल्ज़न ने दक्षिणी ध्रुव पर न्यूट्रिनो पकड़ने का अपना सपना पहली बार दुनिया के सामने रखा। उनका मानना था कि बर्फ के नीचे की साफ परत कणों को पकड़ने का काम कर सकती है।
  2. सपना जल्दी पकड़ गया। कुछ ही साल में बर्फ में सेंसरों का शुरुआती परीक्षण हुआ और आइसक्यूब का निर्माण आगे बढ़ा। द हिंदू के अनुसार, इसका निर्माण 2010 में पूरा हुआ।
  3. 2013 में शोधकर्ताओं ने पहली बार उच्च-ऊर्जा ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो की सूचना दी। द हिंदू के अनुसार, इन कणों के पर्याप्त टकराव देखने के लिए बर्फ का इतना विशाल आयतन जरूरी था।
  4. 2018 में एक न्यूट्रिनो को दूर के ब्लेज़ार से जोड़ा गया। ब्लेज़ार वह आकाशगंगा है, जिसके केंद्र में विशालकाय ब्लैक होल पृथ्वी की ओर कणों और विकिरण की धारा फेंकता है।
  5. 6 अक्टूबर 2026 को स्टॉकहोम में नोबेल का ऐलान हुआ। अल जज़ीरा के अनुसार, फिज़िक्स टुडे के मुख्य संपादक रिचर्ड फिट्ज़गेराल्ड ने कहा कि हाल के वर्षों में भौतिकी का नोबेल शायद ही किसी अकेले विजेता को मिला हो, जबकि इस वेधशाला को सैकड़ों लोगों ने मिलकर बनाया था।

भारत का पुराना रिश्ता

इस खबर का भारत से भी जुड़ाव है। द हिंदू के अनुसार, 1950 और 1960 के दशक में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई के भौतिकविद् कर्नाटक के कोलार गोल्ड फील्ड्स की गहरी खदानों से ब्रह्मांडीय किरणों का अध्ययन करते थे। 1964-65 में एक अंतरराष्ट्रीय सहयोग ने जमीन के करीब 2.3 किलोमीटर नीचे डिटेक्टर लगाए और वायुमंडलीय न्यूट्रिनो दर्ज किए। यह प्रयोग दक्षिण अफ्रीका की सोने की खदान के प्रतिस्पर्धी प्रयोग के लगभग साथ-साथ हुआ था।

कोलार के प्रयोग दशकों तक चले, पर 1992 में खदानें बंद होने के साथ वे थम गए। बाद में भारत ने इस परंपरा को फिर जीवित करने की सोची। तमिलनाडु के थेनी जिले के पोट्टीपुरम में इंडिया-बेस्ड न्यूट्रिनो वेधशाला (आईएनओ) प्रस्तावित हुई। इसका 50,000 टन का चुंबकीय लौह कैलोरीमीटर वायुमंडलीय न्यूट्रिनो के दोलन और पृथ्वी के पदार्थ के प्रभाव का अध्ययन करता। पर पर्यावरणीय और स्थानीय विरोध के कारण यह परियोजना अटक गई और नियोजित प्रयोगशाला कभी बनी नहीं।

द हिंदू के अनुसार, दोनों प्रयोग बुनियादी तौर पर अलग हैं। आईएनओ अपेक्षाकृत कम ऊर्जा वाले वायुमंडलीय न्यूट्रिनो के लिए था, जबकि आइसक्यूब उच्च-ऊर्जा खगोलीय न्यूट्रिनो के लिए बना है।

इनाम की रकम और आगे की घोषणाएं

नोबेल विजेताओं का चयन रॉयल स्वीडिश अकादमी ऑफ साइंसेज करती है। रॉयटर्स के अनुसार, इनाम की कुल राशि 12 मिलियन स्वीडिश क्रोनर है, जो करीब 12 लाख अमेरिकी डॉलर, यानी मौजूदा विनिमय दर पर लगभग ₹10.6 करोड़ के बराबर है। पुरस्कार 10 दिसंबर को स्टॉकहोम में स्वीडन के राजा कार्ल सोलहवें गुस्ताफ देंगे। इसके बाद स्टॉकहोम सिटी हॉल में भोज होगा।

यह इस साल का दूसरा नोबेल था। सोमवार को चिकित्सा का नोबेल दो अमेरिकी वैज्ञानिकों को मिला था। बुधवार को केमिस्ट्री का नोबेल घोषित होना था। पिछले साल भौतिकी का नोबेल जॉन क्लार्क, मिशेल डेवोरे और जॉन मार्टिनिस को क्वांटम भौतिकी के प्रयोगों के लिए मिला था।

आगे क्या दिखेगा

खुद हैल्ज़न ने नोबेल समिति को फोन पर कहा कि वह एक प्रस्ताव पर काम कर रहे हैं और उम्मीद है कि यह पुरस्कार उसे मंजूर कराने में मदद करेगा। ऐलान के समय दर्शक हंसे। समिति का मानना है कि आइसक्यूब से लगातार जुट रहा डेटा उन हिंसक प्रक्रियाओं के बारे में नई जानकारी देगा जिनमें उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो पैदा होते हैं। यह अब तक अज्ञात ब्रह्मांडीय घटनाओं का भी खुलासा कर सकता है।

नोबेल समिति की सदस्य ईवा लिंड्रॉथ ने अल जज़ीरा से कहा कि न्यूट्रिनो ऐसी सूचना देते हैं, जो किसी और तरीके से नहीं मिल सकती। विज्ञान के लिए यह खबर याद दिलाती है कि ब्रह्मांड को देखने का एक नया चश्मा अब औपचारिक मान्यता पा चुका है।

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फ्रांसिस हैल्ज़न कौन हैं?
फ्रांसिस हैल्ज़न 82 वर्षीय बेल्जियम-अमेरिकी कण भौतिकविद् हैं, जो अमेरिका के विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। उन्होंने 1988 में दक्षिणी ध्रुव की बर्फ को न्यूट्रिनो डिटेक्टर बनाने का प्रस्ताव रखा था। आइसक्यूब वेधशाला उन्हीं के इस सपने का परिणाम है।
न्यूट्रिनो को 'भूतिया कण' क्यों कहा जाता है?
न्यूट्रिनो में लगभग द्रव्यमान नहीं होता और न ही विद्युत आवेश होता है। इसलिए ये ग्रहों, तारों और इंसानी शरीर के आर-पार निकल जाते हैं। अल जज़ीरा के अनुसार हर सेकंड करीब 100 ट्रिलियन न्यूट्रिनो हमारे शरीर से गुजरते हैं। पकड़ में न आने की इसी आदत के कारण इन्हें भूतिया कण कहा जाता है।
आइसक्यूब इतना विशाल क्यों बनाया गया?
ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो बेहद दुर्लभ होते हैं, इसलिए पर्याप्त टकराव देखने के लिए बर्फ का विशाल आयतन जरूरी था। द हिंदू के अनुसार आइसक्यूब एक घन किलोमीटर, यानी करीब 91.7 करोड़ लीटर पानी के बराबर बर्फ को घेरता है। इसमें 5,160 सेंसर लगे हैं और इसका निर्माण 2010 में पूरा हुआ।
भारत का इस खोज से क्या लेना-देना है?
भारत में न्यूट्रिनो शोध की लंबी परंपरा है। द हिंदू के अनुसार 1964-65 में कोलार गोल्ड फील्ड्स की खदानों में वायुमंडलीय न्यूट्रिनो दर्ज किए गए थे। बाद में तमिलनाडु में आईएनओ परियोजना प्रस्तावित हुई, पर वह बन नहीं पाई। आइसक्यूब इसी परंपरा का अंतरराष्ट्रीय विस्तार जैसा है।

Sources

  1. Reuters: Francis Halzen wins 2026 Nobel Prize in Physics (reuters.com)
  2. The Hindu: Pioneer of IceCube neutrino detector wins 2026 Physics Nobel (thehindu.com)
  3. Al Jazeera: Francis Halzen wins Nobel Prize in Physics for work on 'ghost particles' (aljazeera.com)
  4. Indian Express: Belgium's Francis Halzen wins Nobel Prize in Physics (indianexpress.com)
  5. New Scientist: Nobel prize in physics awarded for discovery of high-energy neutrinos (newscientist.com)

Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.

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