नोबेल रसायन 2026: कागन-सोआई ने सुलझाई अणुओं की पहेली

बुधवार को जापान के एक रसायनज्ञ खरीदारी में व्यस्त थे, जब उनके फोन पर स्टॉकहोम से कॉल आई। फोन उठाते ही उन्हें वह खबर मिली, जिसने उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दिन बना दिया। केनसो सोआई ने उसी फोन पर प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़कर कहा कि यह उनकी ज़िंदगी के 'सबसे रोमांचक दिनों' में से एक है। समाचार एजेंसी एपी की खबर के अनुसार, सोआई टोक्यो के पास अपने घर के नज़दीक ही थे, जब नोबेल समिति का फोन आया।
2026 का रसायन विज्ञान नोबेल सोआई और फ्रांस के आंद्रे बी. कागन के बीच बंटा है। प्रशस्ति पत्र में लिखा है कि यह सम्मान 'असममित कार्बनिक संश्लेषण में गैर-रेखीय प्रभावों और स्व-उत्प्रेरण (ऑटोकैटालिसिस) की खोज' के लिए दिया जा रहा है। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, प्रेस कॉन्फ्रेंस के समय तक समिति कागन से सीधा संपर्क नहीं साध पाई थी। रिपोर्टों के अनुसार, कागन की उम्र 95 वर्ष है। दोनों वैज्ञानिक 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर, यानी करीब 12 लाख अमेरिकी डॉलर की पुरस्कार राशि साझा करेंगे।
पहली पहेली: अणुओं के 'दाएं-बाएं हाथ'
अपने दोनों हाथों को देखिए। एक-दूसरे के आइने में दिखने वाले प्रतिबिंब, मगर दायां दस्ताना बाएं हाथ में नहीं चढ़ता। रसायन विज्ञान में बहुत से अणु ऐसे ही होते हैं। दो रूप, जो एक-दूसरे के आइना-प्रतिबिंब हैं। रसायनज्ञ इन्हें 'काइरल' कहते हैं। यह शब्द ग्रीक भाषा के 'हाथ' शब्द से आया है। नोबेल समिति के अध्यक्ष हाइनर लिंके ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में हाथों का यही उदाहरण दिया था।
पहेली यह है कि जीवन के अणुओं में इन दोनों में से हमेशा सिर्फ एक रूप मिलता है। प्रोटीन हो या शुगर, डीएनए के निर्माण खंड हों या कोशिकाओं के दूसरे अणु, प्रकृति ने एक ही 'हाथ' चुना है। इसी घटना को 'होमोकाइरैलिटी' कहते हैं। प्रयोगशाला में जब रसायनज्ञ कोई अभिक्रिया कराते, तो दोनों रूप बराबर-बराबर बनते, पचास-पचास। प्रकृति अकेले चुनती थी। इंसान नहीं चुन पाता था।
यह चुनाव सिर्फ दार्शनिक सवाल नहीं है। लिंके ने कहा कि दवाओं में इस्तेमाल होने वाले बहुत से सक्रिय अणु काइरल होते हैं। एक 'हाथ' का असर इलाज जैसा हो सकता है, जबकि दूसरे का कोई असर न हो, या सबसे बुरे मामले में वह नुकसानदेह भी हो सकता है। गलत हाथ वाली दवा बेअसर या खतरनाक। इसलिए रसायनज्ञों को सिर्फ सही वाला रूप बनाने का तरीका चाहिए था। दशकों तक यह तरीका किसी के पास नहीं था। न्यू साइंटिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, यही वजह है कि यह खोज दवाओं के साथ-साथ खेती के काम आने वाले रसायनों के बड़े पैमाने पर उत्पादन में भी काम आई।
दो वैज्ञानिक, दो बड़ी छलांग
इस दीवार में पहली दरार फ्रांस में पड़ी। आंद्रे बी. कागन यूनिवर्सिटे पेरिस-सुद, ऑर्से से जुड़े हैं। उन्होंने उत्प्रेरकों (कैटालिस्ट) के ज़रिए अभिक्रियाओं को नियंत्रित करने का रास्ता खोजा, ताकि दोनों आइना-रूपों में से एक ज़्यादा बने। समय को लेकर खबरों में मामूली अंतर है। सीएनएन इस काम को अस्सी के दशक की शुरुआत का बताता है, जबकि न्यू साइंटिस्ट 1986 का ज़िक्र करता है। लेकिन दोनों इस बात पर एकमत हैं कि कागन का काम असममित संश्लेषण की नींव बना। उनके खोजे 'गैर-रेखीय प्रभावों' ने बताया कि उत्प्रेरक की थोड़ी-सी असममितता अभिक्रिया के नतीजे को उम्मीद से कहीं ज़्यादा एक तरफ झुका सकती है।
इस नींव पर इमारत खड़ी की जापान के केनसो सोआई ने। टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस में उन्होंने 1995 में ऐसी अभिक्रिया बनाने की ठानी, जिसमें दो में से सिर्फ एक आइना-रूप बने। 2003 में वह इसमें कामयाब हुए। 'सोआई रिएक्शन' नाम से मशहूर यह अभिक्रिया स्व-उत्प्रेरण पर टिकी है। इसमें चुना हुआ अणु खुद अपने जैसे और अणु बनाता जाता है। एक छोटी-सी शुरुआत अपने आप बढ़ती जाती है, जब तक ज्यादातर उत्पाद उसी एक रूप के न हो जाएं। नोबेल समिति ने कहा, जीवन के अलावा यह कारनामा अब तक किसी ने नहीं किया था।
लिंके ने अपने बयान में कहा कि कागन और सोआई ने एक सदी से भी पुरानी इस रासायनिक पहेली का हल दिया है, यानी होमोकाइरैलिटी अपने आप कैसे उभर सकती है। उनकी रासायनिक अभिक्रियाएं, उनके शब्दों में, 'शानदार' हैं।
एक नज़र में: कागन बनाम सोआई
| आंद्रे बी. कागन | केनसो सोआई | |
|---|---|---|
| देश और संस्थान | फ्रांस; यूनिवर्सिटे पेरिस-सुद, ऑर्से | जापान; टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस |
| बड़ी खोज | उत्प्रेरकों से अभिक्रिया को एक तरफ झुकाना; गैर-रेखीय प्रभाव | सिर्फ एक आइना-रूप बनाने वाली अभिक्रिया; स्व-उत्प्रेरण |
| समय | अस्सी का दशक (न्यू साइंटिस्ट के अनुसार 1986) | 1995 में शुरुआत, 2003 में कामयाबी |
| पहचान | असममित संश्लेषण की नींव रखने वाले | 'सोआई रिएक्शन' के जनक |
दवा की गोली से खेत तक
यह खोज प्रयोगशाला की शोभा नहीं रही। न्यू साइंटिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, इस तकनीक से आज दर्दनाशक दवाएं, अवसादरोधी दवाएं और पार्किंसंस के इलाज की दवाएं बड़े पैमाने पर बनती हैं। फसल की पैदावार बढ़ाने वाले कीटनाशक बनाने में भी यही तकनीक काम आती है।
केमिस्ट्री वर्ल्ड के बिज़नेस एडिटर फिलिप ब्रॉडविथ ने सीएनएन से कहा कि अणु का कौन-सा आइना-रूप बनाना है, यह चुनने की क्षमता दवा उद्योग के साथ-साथ स्वाद और इत्र उद्योग के लिए भी अहम है। उनके अनुसार, यह काम यह समझने में भी मदद करता है कि धरती के सारे काइरल अणु, हमारे प्रोटीन, शुगर और जैव-अणु, एक ही 'हाथ' में कैसे स्थिर हो गए। यह विज्ञान का एक रोमांचक पहलू है।
समिति का कहना है कि इन दोनों की खोजों ने रसायनज्ञों को रोज़ के काम के नए औज़ार दिए हैं और जीवन की उत्पत्ति के रसायन में नई दिलचस्पी जगाई है। एपी की खबर के अनुसार, नोबेल विज्ञप्ति में कहा गया है कि ये खोजें दवा निर्माण के लिए अभिक्रियाएं डिज़ाइन करने वाले रसायनज्ञों के लिए 'निर्णायक' रही हैं। सीएनएन की रिपोर्ट के अनुसार, इस काम ने दवा निर्माण की तकनीक को आगे बढ़ाया है।
भारत में यह खबर कैसे आई
हिंदी अखबार जनसत्ता ने इस खबर को 'सुलझाई 100 साल पुरानी पहेली' की सुर्खी के साथ छापा। सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को सैकड़ों लाइक्स मिले और टिप्पणियों में दो तरह की प्रतिक्रियाएं दिखीं। एक तरफ विजेताओं को बधाई, दूसरी तरफ यह सवाल कि नोबेल की सूची में भारतीय वैज्ञानिक क्यों नहीं दिखते। कई पाठकों ने शोध और विकास पर सरकारी खर्च बढ़ाने की मांग दोहराई। कुछ टिप्पणियों में देश में विज्ञान को लेकर राजनीति पर नाराज़गी भी दिखी।
भारत के लिहाज़ से इस नोबेल की एक सीधी प्रासंगिकता भी है। नोबेल विज्ञप्ति के अनुसार, यह खोज दवा बनाने की अभिक्रियाएं डिज़ाइन करने वालों के लिए निर्णायक रही है। और दवा उद्योग वह क्षेत्र है, जहां सही अणु चुनने की यह तकनीक सीधे काम आती है। न्यू साइंटिस्ट के अनुसार, इसी तकनीक से दर्दनाशक से लेकर पार्किंसंस की दवाओं तक का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हुआ है।
अब आगे क्या होगा
नोबेल सप्ताह का सिलसिला अभी बाकी है। सोमवार को चिकित्सा का नोबेल उन तीन वैज्ञानिकों को मिला था, जिनके काम से मस्तिष्क की कार्यप्रणाली सुलझाने का औज़ार बना। मंगलवार को भौतिकी का पुरस्कार फ्रांसिस हैल्ज़न को मिला, जिनकी अंटार्कटिका स्थित आइसक्यूब वेधशाला ने 'भूतिया' कणों, यानी न्यूट्रिनो की नई खगोलिकी की नींव रखी। रसायन के बाद गुरुवार को साहित्य और शुक्रवार को शांति पुरस्कार की घोषणा होगी। अर्थशास्त्र का नोबेल स्मृति पुरस्कार 12 अक्टूबर को घोषित होगा।
रसायन विज्ञान के इस नोबेल पर अब दो दिशाओं में नज़र रहेगी। एक, स्व-उत्प्रेरण की यह अवधारणा जीवन की उत्पत्ति की पहेली पर आगे क्या रोशनी डालती है। दो, दवा उद्योग इस तकनीक को और सस्ती, और सुरक्षित दवाओं में कितनी तेज़ी से बदल पाता है। पिछले साल रसायन का नोबेल धातु-कार्बनिक ढांचों पर काम करने वाले तीन वैज्ञानिकों, सुसुमु कितागावा, रिचर्ड रॉबसन और उमर यागी को मिला था। इस साल की कहानी उससे अलग है। यह अणुओं के हाथों की कहानी है।
Questions people ask
- 2026 का रसायन विज्ञान नोबेल किसे मिला?
- फ्रांस के आंद्रे बी. कागन और जापान के केनसो सोआई को। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज़ ने 7 अक्टूबर 2026 को स्टॉकहोम में घोषणा की कि यह सम्मान असममित कार्बनिक संश्लेषण में गैर-रेखीय प्रभावों और स्व-उत्प्रेरण की खोज के लिए दिया जा रहा है। दोनों वैज्ञानिक 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर (करीब 12 लाख डॉलर) की पुरस्कार राशि साझा करेंगे।
- होमोकाइरैलिटी क्या है?
- कुछ अणु दो रूपों में होते हैं, जो एक-दूसरे के आइना-प्रतिबिंब हैं, जैसे दायां और बायां हाथ। प्रकृति में जीवन के अणुओं, प्रोटीन और शुगर में इन दोनों में से हमेशा सिर्फ एक रूप मिलता है। इसी घटना को होमोकाइरैलिटी कहते हैं। यह एक सदी से रसायनज्ञों के लिए पहेली थी, क्योंकि प्रयोगशाला में दोनों रूप बराबर-बराबर बनते थे।
- 'सोआई रिएक्शन' क्या है?
- यह केनसो सोआई की वह अभिक्रिया है, जिसमें दो संभावित आइना-रूपों में से सिर्फ एक बनता है। इसमें चुना हुआ अणु खुद अपने जैसे और अणु बनाता जाता है, इसे स्व-उत्प्रेरण कहते हैं। सोआई ने 1995 में इस पर काम शुरू किया और 2003 में कामयाब हुए।
- इस खोज का आम आदमी से क्या लेना-देना?
- बहुत कुछ। न्यू साइंटिस्ट के अनुसार, इसी तकनीक से दर्दनाशक दवाएं, अवसादरोधी दवाएं और पार्किंसंस के इलाज की दवाएं बड़े पैमाने पर बनती हैं। फसल की पैदावार बढ़ाने वाले कीटनाशक और इत्र-सुगंध उद्योग में भी यही तकनीक काम आती है। गलत 'हाथ' वाला अणु बेअसर या नुकसानदेह हो सकता है, इसलिए सही रूप चुनना दवा की सुरक्षा से जुड़ा है।
Sources
- Reuters — Kagan and Soai win 2026 Nobel chemistry prize (reuters.com)
- CNN — Henri Kagan and Kenso Soai awarded the Nobel Prize in chemistry (cnn.com)
- New Scientist — Nobel prize in chemistry awarded for work on mirror molecules (newscientist.com)
- AP/NPR — Henri B. Kagan and Kenso Soai win Nobel Prize in chemistry (weku.org)
Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.
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