कुबेरेश्वर धाम की जगह पहले क्या था? सीहोर की कहानी
By the Gagariya desk · 21 Aug 2026 IST · 7 min read

कभी-कभी किसी जगह की सबसे बड़ी कहानी उसकी आज की तस्वीर में नहीं, बल्कि उस जगह को पहली बार देखने वाले लोगों की यादों में छिपी होती है। सीहोर के कुबेरेश्वर धाम की कहानी मेरे लिए कुछ ऐसी ही है।
मेरा घर कुबेरेश्वर धाम से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है। आज जहां दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु दिखाई देते हैं, जहां बड़े धार्मिक आयोजन होते हैं और जहां पंडित प्रदीप मिश्रा की शिव महापुराण कथाओं के कारण देशभर में लोग इस जगह को जानते हैं, उसी रास्ते से मैं कभी स्कूल जाया करता था।
उस समय मेरी नजर में वहां ऐसा कुछ नहीं था, जिसे देखकर लगे कि आने वाले वर्षों में यह जगह इतनी बड़ी पहचान बना लेगी। आसपास खेत थे, खुली जमीन थी और गांव का सामान्य माहौल था।
फिर एक साल के भीतर दृश्य बदलने लगा।
पहले वहां कुछ ऐसा दिखाई दिया जिसे देखकर मुझे लगा कि शायद किसी ने अपना घर या कोई नया निर्माण शुरू किया है। नाव जैसी आकृति, भगवान शंकर और उसमें बैठे भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण की प्रतिमाएं नजर आने लगीं। मैं समझ नहीं पा रहा था कि आखिर यहां हो क्या रहा है।
कुछ समय बाद गांव के लोगों की बैठकों और वहां चल रही गतिविधियों से पता चला कि पंडित प्रदीप मिश्रा के मार्गदर्शन में यहां आश्रम और धार्मिक गतिविधियों की शुरुआत हो रही है और आगे कथा का आयोजन भी होना है। उस समय यह सब आज की तरह विशाल नहीं था। लेकिन शायद कहानी की शुरुआत वहीं से हो चुकी थी।
क्या सचमुच यहां पहले सिर्फ खेत हुआ करते थे?
यह सवाल आज भी मेरे मन में आता है। और शायद यही सवाल बहुत से स्थानीय लोगों के मन में भी रहा होगा।
मेरी अपनी यादों में यहां का दृश्य आज से बिल्कुल अलग था। लेकिन व्यक्तिगत याद और आधिकारिक इतिहास में फर्क होता है। उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार चितावलिया हेमा गांव में कुबेरेश्वर महादेव मंदिर की नींव करीब 2016 में रखी गई थी।
यानी आज जिस जगह को लोग एक बड़े धार्मिक केंद्र के रूप में जानते हैं, उसका आधुनिक विकास अचानक एक दिन में नहीं हुआ। यह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। पहले निर्माण हुआ, फिर धार्मिक गतिविधियां बढ़ीं और बाद में कथाओं तथा बड़े आयोजनों ने इस स्थान की पहचान को काफी व्यापक कर दिया।
पंडित प्रदीप मिश्रा की आधिकारिक वेबसाइट भी कुबेरेश्वर धाम को चितोड़िया हेमा, सीहोर से जोड़ती है और बताती है कि यह स्थान उनकी धार्मिक गतिविधियों से निकटता से जुड़ा है।
मेरे लिए असली सवाल भगवान की प्रतिमा का था
बचपन में मेरे मन में एक बहुत सीधा सवाल था—अगर यहां पहले ऐसा कुछ नहीं था, तो अचानक भगवान यहां कहां से आ गए?
यह सवाल शायद सुनने में साधारण लगे, लेकिन मेरे लिए यह काफी बड़ा सवाल था। मैं उस जगह को पहले से देखता आया था। इसलिए जब वहां धीरे-धीरे धार्मिक प्रतीक, प्रतिमाएं और आश्रम दिखाई देने लगे, तो स्वाभाविक रूप से मन में जिज्ञासा हुई।
मैंने यह सवाल अपने दादाजी से पूछा।
उनका जवाब मेरे लिए आज भी इस पूरी कहानी का सबसे खूबसूरत हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि पंडित प्रदीप मिश्रा सीहोर के ही रहने वाले हैं। अगर उन्होंने अपने ही क्षेत्र में आश्रम की शुरुआत की, तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है? यह उनकी मातृभूमि है। किसी व्यक्ति का अपने ही गांव और अपनी धरती पर धार्मिक काम शुरू करना अपने आप में असामान्य नहीं है।
उन्होंने एक और बात कही, जो उस समय शायद पूरी तरह समझ नहीं आई थी।
उन्होंने कहा कि सीहोर की धरती को भगवान और धार्मिक परंपराओं से जोड़कर देखने वाले लोगों के लिए यहां शिव की आराधना का केंद्र बनना कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
फिर मैंने दूसरा सवाल पूछा—लेकिन जो लोग इतनी आस्था से यहां आते हैं, उनका क्या?
दादाजी ने कहा, इसमें गलत क्या है?
दादाजी की वह बात जो आज भी याद है
इसके बाद उन्होंने मुझे भक्ति को समझाने वाली एक ऐसी बात बताई, जो किसी किताब की परिभाषा से ज्यादा सरल थी।
उन्होंने कहा—अगर किसी एक जगह की रोज पूजा की जाए, उसे पूरे मन से याद किया जाए और वहां श्रद्धा रखी जाए, तो भक्त के लिए वह जगह साधारण जगह नहीं रहती। उसके भीतर भगवान का भाव पैदा हो जाता है।
और उन्होंने आगे कहा कि जब किसी स्थान पर विधि-विधान से भगवान की स्थापना और पूजा होती है, तो केवल यह पूछते रहना कि भगवान पहले से वहां थे या नहीं, शायद भक्ति की असली बात को समझना नहीं है।
उनका कहना था कि भगवान कण-कण में हैं।
यह बात मेरे लिए उस समय एक जवाब थी। आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि यह सिर्फ भगवान की मौजूदगी के बारे में जवाब नहीं था। यह आस्था को देखने का एक तरीका था।
खाली जमीन से धार्मिक पहचान तक का सफर
कुबेरेश्वर धाम की कहानी को समझने के लिए शायद यही बदलाव सबसे दिलचस्प है।
एक ऐसी जगह जिसे स्थानीय लोग सामान्य ग्रामीण परिवेश के हिस्से के रूप में जानते थे, धीरे-धीरे धार्मिक गतिविधियों का केंद्र बनने लगी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यहां मंदिर की नींव 2016 के आसपास रखी गई थी।
बाद के वर्षों में पंडित प्रदीप मिश्रा की शिव महापुराण कथाओं और धार्मिक आयोजनों ने इस स्थान को सीहोर से बाहर भी पहचान दिलाई। 2023 की रिपोर्टों में कुबेरेश्वर धाम को पंडित प्रदीप मिश्रा के आश्रम और बड़े धार्मिक आयोजनों से जोड़ते हुए लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ का उल्लेख किया गया था।
यानी जिस बदलाव को मैंने सड़क से गुजरते हुए धीरे-धीरे देखा, वह बाद में बहुत बड़ी धार्मिक कहानी का हिस्सा बन गया।
इस बदलाव में गांव की भूमिका भी थी
मेरी याद में एक और बात खास है—शुरुआती समय में गांव के लोगों का साथ।
जब कोई नई जगह विकसित होती है तो बाहर से देखने वाले व्यक्ति को सिर्फ निर्माण दिखाई देता है। लेकिन स्थानीय लोगों के लिए वह बदलाव रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा होता है। रास्ते बदलते हैं, लोग आने लगते हैं, नए चेहरे दिखाई देते हैं और धीरे-धीरे गांव का नाम भी बाहर की दुनिया में पहचाना जाने लगता है।
कुबेरेश्वर धाम के साथ भी ऐसा बदलाव दिखाई दिया। शुरुआत में जो गतिविधियां स्थानीय स्तर की लगती थीं, वे धीरे-धीरे बड़े धार्मिक आयोजनों में बदलती गईं। पंडित प्रदीप मिश्रा की कथाओं और रुद्राक्ष से जुड़े आयोजनों के कारण धाम की चर्चा देशभर में पहुंची। 2023 में रुद्राक्ष महोत्सव के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की खबरें सामने आई थीं।
फिर सवाल आता है—भगवान यहां पहले थे या बाद में आए?
शायद इस सवाल का कोई ऐसा जवाब नहीं है जिसे हर व्यक्ति एक जैसा स्वीकार करे। इतिहास अपने प्रमाण मांगता है। आस्था अपने अनुभव।
अगर कोई व्यक्ति पूछे कि यहां पहले क्या था, तो उपलब्ध जानकारी और स्थानीय यादों को अलग-अलग देखना जरूरी है। आधुनिक कुबेरेश्वर धाम का विकास बाद के वर्षों में हुआ और मंदिर की नींव 2016 के आसपास रखे जाने की रिपोर्ट मिलती है।
लेकिन अगर कोई श्रद्धालु पूछे कि उसे यहां भगवान क्यों महसूस होते हैं, तो उसका उत्तर उसके विश्वास में है।
यही वह जगह है जहां मेरे दादाजी की बात फिर याद आती है—भगवान को केवल पत्थर, मूर्ति या किसी एक स्थान तक सीमित करके देखना जरूरी नहीं। जिस जगह पर लोग सच्चे मन से पूजा करते हैं, वहां उनके लिए उस आस्था का महत्व अपने आप बन जाता है।
आज जब उसी रास्ते से गुजरता हूं...
आज अगर मैं उसी रास्ते से गुजरता हूं, तो बचपन का वह दृश्य और सामने का वर्तमान एक साथ याद आता है।
एक तरफ खेतों और खुली जमीन की पुरानी तस्वीर है। दूसरी तरफ आज का कुबेरेश्वर धाम है, जहां धार्मिक आयोजन होते हैं और दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। पंडित प्रदीप मिश्रा की आधिकारिक वेबसाइट भी इस स्थान को शिव आराधना, धार्मिक शिक्षा और विभिन्न आयोजनों के केंद्र के रूप में प्रस्तुत करती है।
मेरे लिए इस जगह की सबसे खास बात शायद यही बदलाव है।
किसी ने एक दिन आकर नहीं कहा था कि यहां हजारों-लाखों लोग आएंगे। शुरुआत छोटी थी। आश्रम की बात थी। कथा की बात थी। गांव की बैठकों की बात थी। फिर धीरे-धीरे लोगों की आस्था जुड़ती गई और जगह की पहचान बदलती गई।
और शायद यही किसी भी तीर्थ की सबसे मानवीय कहानी होती है—पहले जगह बनती है, फिर लोग आते हैं, फिर उनकी आस्था उस जगह को अर्थ देती है।
अब कुबेरेश्वर धाम की कहानी कहां जा रही है?
आज कुबेरेश्वर धाम केवल उस जगह का नाम नहीं है जिसे सीहोर के स्थानीय लोग जानते हैं। यह पंडित प्रदीप मिश्रा की कथाओं, शिव भक्ति और बड़े धार्मिक आयोजनों के कारण देशभर में पहचाना जाने लगा है। आधिकारिक वेबसाइट पर भी धाम को धार्मिक कार्यक्रमों, पूजा-अर्चना और भक्तों की सेवाओं से जुड़े केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
लेकिन मेरे लिए इसकी कहानी अभी भी वहीं से शुरू होती है जहां एक बच्चा स्कूल जाते हुए सड़क के किनारे बदलती हुई उस जमीन को देख रहा था और सोच रहा था—यहां अचानक यह सब कहां से आ गया?
आज उस सवाल का जवाब शायद थोड़ा अलग है।
शायद भगवान अचानक नहीं आए थे। शायद पहले लोगों की आस्था आई। फिर पूजा आई। फिर सेवा आई। फिर कथा आई। और धीरे-धीरे एक ऐसी जगह बन गई जिसे आज लोग कुबेरेश्वर धाम के नाम से जानते हैं।
और दादाजी की आखिरी बात आज भी इस पूरी कहानी पर सबसे ज्यादा फिट बैठती है—भगवान कण-कण में हैं। जब लाखों लोग एक जगह श्रद्धा लेकर पहुंचते हैं, तो उस जगह को देखने के लिए सिर्फ आंखें नहीं, लोगों की आस्था भी पहुंचती है।
अब देखने वाली बात यह है कि आने वाले वर्षों में कुबेरेश्वर धाम का विस्तार किस रूप में होता है और सीहोर के इस स्थानीय धार्मिक केंद्र की कहानी कितनी दूर तक जाती है।
Questions people ask
- कुबेरेश्वर धाम की जगह पहले क्या था?
- स्थानीय यादों में यह क्षेत्र पहले ग्रामीण परिवेश, खेतों और खुली जमीन का हिस्सा दिखाई देता था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार कुबेरेश्वर महादेव मंदिर की नींव लगभग 2016 में रखी गई थी। इसलिए आज दिखाई देने वाला बड़ा धार्मिक परिसर बाद के वर्षों में विकसित हुआ।
- कुबेरेश्वर धाम कब विकसित होना शुरू हुआ?
- अमर उजाला की एक रिपोर्ट के अनुसार चितावलिया हेमा गांव में मुरली मनोहर एवं कुबेरेश्वर महादेव मंदिर की नींव करीब 2016 में रखी गई थी। इसके बाद धार्मिक गतिविधियों और कथाओं के विस्तार के साथ यह स्थान तेजी से प्रसिद्ध हुआ।
- कुबेरेश्वर धाम का पंडित प्रदीप मिश्रा से क्या संबंध है?
- कुबेरेश्वर धाम पंडित प्रदीप मिश्रा की धार्मिक गतिविधियों और शिव महापुराण कथाओं से गहराई से जुड़ा है। उनकी आधिकारिक वेबसाइट धाम को चितोड़िया हेमा, सीहोर में स्थित उनके प्रमुख धार्मिक केंद्र के रूप में प्रस्तुत करती है।
- कुबेरेश्वर धाम इतना प्रसिद्ध कैसे हुआ?
- कुबेरेश्वर धाम की पहचान मंदिर और आश्रम के विकास के साथ बढ़ी, लेकिन पंडित प्रदीप मिश्रा की शिव महापुराण कथाओं, धार्मिक आयोजनों और रुद्राक्ष से जुड़े कार्यक्रमों ने इसे सीहोर से बाहर भी व्यापक पहचान दिलाई। 2023 में यहां बड़े स्तर पर श्रद्धालुओं के पहुंचने की खबरें आई थीं।
- क्या कुबेरेश्वर धाम पहले से ही बहुत पुराना मंदिर था?
- उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में आधुनिक कुबेरेश्वर धाम के मंदिर की नींव लगभग 2016 में रखे जाने की जानकारी मिलती है। इसलिए वर्तमान धाम के विकास और किसी संभावित प्राचीन स्थानीय धार्मिक परंपरा को एक ही बात मानना उचित नहीं होगा। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर दोनों को अलग-अलग देखना चाहिए।
Sources
- सीहोर के कुबेरेश्वर धाम का इतिहास — amarujala.com
- Pandit Pradeep Mishra Official Website — panditpradeepmishra.co.in
- Kubereshwar Dham Sehore Official Website — kubreshwardham.org
- पंडित प्रदीप मिश्रा की शिक्षक से महाराज बनने की कहानी — abplive.com
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