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कैंसर की दवाएं 70% तक सस्ती: मार्जिन पर 30% की लगाम

By Gagariya Editorial Desk•9 Oct 2026 IST•4 min read•Human Reviewed & Fact-Checked
कैंसर की दवाएं 70% तक सस्ती: मार्जिन पर 30% की लगाम
Photo: Own or licensed by the publisher

एक दवा, दो कीमतें

एक ही दवा। थोक में ₹2,700। पर्चे पर ₹27,000।

यही वह लगभग ग्यारह गुना का फर्क था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर को केंद्र सरकार को आईना दिखाया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा था, "This is carnage. Plain and simple." केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से बेंच ने कहा कि सभी दवाओं पर 16 फीसदी का एकसमान मार्जिन लागू होना चाहिए। जवाब में तुषार मेहता ने कहा कि सरकार एक संतुलित हल निकालेगी।

अदालत की इस खरी-खरी के कुछ ही दिन बाद सरकार ने अपने जवाब का ऐलान कर दिया है। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) ने 8 अक्टूबर को नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के 30 फीसदी तक सीमित करने का फैसला सुनाया।

फैसला क्या है

सरकारी सूत्रों के हवाले से पीटीआई ने बताया कि यह फैसला नॉन-शेड्यूल्ड यानी मूल्य नियंत्रण से बाहर की सभी कैंसर दवाओं पर लागू होगा। ब्रांडेड और जेनेरिक, देसी और आयातित, पेटेंटेड और नॉन-पेटेंटेड, हर तरह की दवा इसके दायरे में आएगी।

दायरे में 110 कैंसर दवाएं हैं, जिनमें 35 पेटेंटेड दवाएं भी शामिल हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक इन दवाओं की एमआरपी 70 फीसदी तक घट सकती है। सरकारी अनुमान के अनुसार कैंसर मरीज़ों को हर साल करीब ₹2,500 करोड़ की बचत होगी।

एनपीपीए ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से कहा है कि दवाओं की सूची तय करने के लिए एक विशेषज्ञ पैनल बनाया जाए। पैनल को 14 अक्टूबर तक अपनी रिपोर्ट सौंपनी है।

मुनाफे का खेल कितना बड़ा

एनपीपीए की बैठक के मिनट्स में शामिल दवा बाज़ार के विश्लेषण के मुताबिक नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर औसत ट्रेड मार्जिन करीब 170 फीसदी है। कुछ मामलों में यह 700 फीसदी तक पहुंच जाता है।

कैंसर दवाओं का बाज़ार करीब 225 दवाओं और 500 फॉर्मूलेशनों का है। इसका सालाना कारोबार लगभग ₹12,500 करोड़ का है। इनमें से मूल्य नियंत्रण के दायरे में आने वाली शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं का हिस्सा करीब ₹2,250 करोड़ का है। बाकी सारी दवाएं नॉन-शेड्यूल्ड हैं, यानी इन पर कोई मूल्य सीमा लागू नहीं होती।

राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची 2022 में 388 दवाएं हैं, जिनमें 63 कैंसर दवाएं शामिल हैं। ये शेड्यूल्ड दवाएं हैं और इन पर पहले से मूल्य नियंत्रण लागू है। असल समस्या बाकी दवाओं के साथ है।

बिज़नेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक नॉन-शेड्यूल्ड दवाएं औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (डीपीसीओ) 2013 के तहत मूल्य सीमा के दायरे में नहीं आतीं। इनके निर्माता 12 महीनों में कीमतें 10 फीसदी तक बढ़ा सकते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक देश के दवा बाज़ार का करीब 82 फीसदी हिस्सा ऐसी ही दवाओं का है।

2019 की नज़ीर

यह पहली बार नहीं है जब एनपीपीए ने ऐसा कदम उठाया है। 2019 में 42 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर इसी तरह 30 फीसदी का मार्जिन तय किया गया था। एनपीपीए के मुताबिक उस समय 526 ब्रांडों की कीमतों में 91 फीसदी तक की कटौती हुई थी और मरीज़ों को हर साल लगभग ₹984 करोड़ की बचत का अनुमान था।

पहलू 2019 का फैसला 2026 का फैसला
दायरे में दवाएं 42 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाएं 110 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाएं, 35 पेटेंटेड समेत
मार्जिन की सीमा एमआरपी का 30 फीसदी एमआरपी का 30 फीसदी
कीमतों में कटौती 526 ब्रांडों पर 91 फीसदी तक 70 फीसदी तक की उम्मीद
सालाना बचत करीब ₹984 करोड़ करीब ₹2,500 करोड़

2019 का फॉर्मूला काम कर चुका है, इसलिए सरकार उसी रास्ते पर आगे बढ़ रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दायरा लगभग तीन गुना बड़ा है।

मिससेलिंग पर लगाम

सूत्रों का कहना है कि ट्रेड मार्जिन रेशनलाइज़ेशन का मुख्य मकसद गलत तरीके से बेचने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना है। दरअसल, जिस दवा पर मार्जिन ज्यादा होता है, उसी को बेचने का रुझान रहता है। कैंसर की दवाएं बाकी दवाओं से महंगी होती हैं, इसलिए पहले इन्हीं पर मार्जिन की लगाम लगाई गई है।

सरकारी सूत्रों का यह भी कहना है कि यह फैसला अदालत की टिप्पणी से जुड़ा नहीं है और 2019 से इस पर काम चल रहा था। स्वास्थ्य विभाग ने दवाओं की अंतिम सूची तैयार करने के लिए एक समिति बनाई है। बाकी दवाओं की कीमतों पर कदम सोच-समझकर उठाया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक सूची फाइनल होते ही नई दरों वाली दवाएं अस्पतालों में भी मिलेंगी।

लागू कब से

पीटीआई के मुताबिक सरकारी सूत्रों ने कहा है कि फैसला इसी महीने लागू होने की उम्मीद है। हालांकि मराठी न्यूज़ चैनल साम टीवी ने अपनी रिपोर्ट में इसे 10 दिनों के भीतर लागू होने की बात कही है। आधिकारिक स्तर पर अभी अंतिम तारीख का ऐलान नहीं हुआ है।

पैनल की रिपोर्ट 14 अक्टूबर को आनी है, इसलिए सूची और नई कीमतें उसके बाद ही साफ होंगी। इसी वजह से फिलहाल आधिकारिक समयरेखा के तौर पर इसी महीने के भीतर लागू होने की बात को आधार माना जा रहा है।

मरीज़ की जेब पर असर

कैंसर का इलाज पहले से ही महंगा है और दवाएं उसका सबसे बड़ा खर्च होती हैं। मार्जिन पर 30 फीसदी की सीमा का सीधा मतलब है कि ₹27,000 की एमआरपी वाली दवा का पुराना गणित अब नहीं चलेगा। बिचौलिए की कमाई सीमित होगी तो मरीज़ को दवा सस्ती मिलेगी।

एनपीपीए ने यह भी दर्ज किया है कि रिटेल, अस्पताल और ऑनलाइन फार्मेसी के दामों में काफी फर्क है। नई व्यवस्था में एमआरपी से दी जाने वाली छूट का खेल भी सीमित होगा।

आगे की राह साफ है। 14 अक्टूबर तक पैनल की रिपोर्ट आएगी। फिर दवाओं की सूची जारी होगी। उस सूची को हर कैंसर मरीज़ और उसके परिजन को ध्यान से देखना चाहिए। शायद उसी सूची में उनकी दवा की कीमत आधी होने का ब्योरा छिपा हो।

Questions people ask

ट्रेड मार्जिन का मतलब क्या है?
ट्रेड मार्जिन वह कमाई है जो दवा निर्माता से लेकर अस्पताल, थोक विक्रेता और दुकानदार तक के रास्ते में जुड़ती है। अगर दवा ₹2,700 में रिटेलर तक पहुंचे और ₹27,000 में बिके, तो बीच का फर्क मार्जिन है। सरकार ने अब इसे एमआरपी के 30 फीसदी तक सीमित किया है.
कौन सी कैंसर दवाएं सस्ती होंगी?
नॉन-शेड्यूल्ड यानी मूल्य नियंत्रण से बाहर की 110 कैंसर दवाएं दायरे में हैं। इनमें ब्रांडेड और जेनेरिक, देसी और आयातित, पेटेंटेड और नॉन-पेटेंटेड, सभी तरह की दवाएं हैं। 35 पेटेंटेड दवाएं भी शामिल हैं। अंतिम सूची स्वास्थ्य विभाग की समिति तैयार कर रही है.
कीमतें कितनी घटेंगी?
सरकार के अनुमान के मुताबिक एमआरपी में 70 फीसदी तक की कटौती हो सकती है। 2019 में इसी फॉर्मूले से 526 ब्रांडों की कीमतें 91 फीसदी तक घटी थीं। अगर यह पैटर्न दोहराया गया, तो कैंसर मरीज़ों को हर साल करीब ₹2,500 करोड़ की बचत होगी। अंतिम कमी दवा दर दवा अलग होगी.
फैसला कब से लागू होगा?
पीटीआई के मुताबिक सरकारी सूत्रों ने कहा है कि फैसला इसी महीने लागू होने की उम्मीद है। एनपीपीए ने कहा है कि दवाओं की सूची तय करने वाला विशेषज्ञ पैनल 14 अक्टूबर तक रिपोर्ट सौंपे। सूची फाइनल होते ही नई दरें अस्पतालों में भी लागू होंगी.
क्या दवाएं मिलनी बंद हो सकती हैं?
सरकार का दावा है कि उपलब्धता बनी रहेगी। एनपीपीए का कहना है कि फैसले का मकसद कीमतें कम करना है, सप्लाई रोकना नहीं। सूची फाइनल होने के बाद नई दरों वाली दवाएं अस्पतालों में भी मिलेंगी। फिर भी इस बार के बड़े दायरे पर नज़र रखना ज़रूरी है.

Sources

  1. DT Next (PTI): Govt to cap trade margins at 30 pc of MRP for anti-cancer drugs (dtnext.in)
  2. Business Standard: Centre to cap trade margins on non-scheduled cancer drugs at 30% (business-standard.com)
  3. ThePrint (PTI): Govt to cap trade margins at 30 pc of MRP for anti-cancer drugs (theprint.in)
  4. The Week: Cancer drug prices set to fall: Government caps trade margins at 30 per cent of MRP (theweek.in)
  5. Deccan Herald: Anti-cancer drug prices to come down as govt caps trade margins at 30% (deccanherald.com)

Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.

This story is informational only and is not medical advice. Decisions about your health belong with a qualified doctor — the sources above are a good place to start reading.

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