सुप्रीम कोर्ट: मेट्रो सामान्य चले, नाजायज हिरासत नहीं

रविवार, 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के नागरिकों को बड़ी राहत दी। न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने विशेष सुनवाई में घोषणा की कि वह एक अंतरिम आदेश पारित करेगी, जिसके तहत दिल्ली मेट्रो और रेल सेवाएं अपने सामान्य शेड्यूल पर चलेंगी, बशर्ते कानून-व्यवस्था की कोई गंभीर स्थिति न पैदा हो।
अदालत ने केंद्र को निर्देश दिया कि जनता की आवाजाही सामान्य की जाए और जो बैरिकेड बेवजह लगाए गए हैं, उन्हें हटा दिया जाए। News18 की रिपोर्ट के अनुसार पीठ ने यह भी कहा कि शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा हुए लोगों को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में नहीं लिया जाएगा और वकीलों को अपने पेशेवर कर्तव्य निभाने से नहीं रोका जाएगा। इंटरनेट सेवाओं की बहाली का निर्देश भी सुनवाई में दिया गया।
पृष्ठभूमि: शनिवार के प्रतिबंधों पर सुनवाई
यह सुनवाई शनिवार, 10 अक्टूबर को दिल्ली में लगे अभूतपूर्व प्रतिबंधों के बाद हुई थी। Cockroach Janta Party (CJP) ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त गयानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था, जिसमें मतदाता-सूची में गड़बड़ी का आरोप लगाया गया है। Mathrubhumi की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस ने 45 मेट्रो स्टेशन बंद किए, इंटरनेट सेवाएं बाधित कीं और राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों, यूट्यूबरों और वकीलों सहित 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया।
सुनवाई का आधार वे याचिकाएं और अवमानना याचिकाएं थीं जिनमें आरोप लगाया गया था कि अधिकारियों ने 9 अक्टूबर के उस अदालती निर्देश का खुला उल्लंघन किया है जिसमें पूर्ण परिवहन बंदी पर रोक लगाई गई थी। Mathrubhumi की रिपोर्ट के अनुसार अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की अवमानना याचिका पर अदालत ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और DMRC अध्यक्ष डी. थारा को नोटिस जारी किया।
सुनवाई के पांच बड़े निर्देश
| निर्देश | अदालत ने क्या कहा |
|---|---|
| मेट्रो और ट्रेन | सेवाएं सामान्य शेड्यूल पर चलें; पूर्ण बंदी तभी जब कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति हो |
| आवाजाही और बैरिकेड | जनता की आवाजाही सामान्य हो; जो बैरिकेड बिल्कुल जरूरी न हों, हटाए जाएं |
| इंटरनेट | सेवाओं में कोई रुकावट न हो; सूचना प्रौद्योगिकी कानून की सामान्य वैधानिक शक्तियां बनी रहेंगी |
| हिरासत | शांतिपूर्ण जमा हुए लोगों की गैरकानूनी हिरासत न हो; शांतिपूर्ण सभा की अनुमति, जहां धारा 163 BNSS के प्रतिबंधात्मक आदेश लागू न हों |
| वकील और पत्रकार | वकीलों, पत्रकारों और पेशेवरों को अपने कर्तव्य निभाने से न रोका जाए |
आदेश के साथ अदालत ने तीनों अधिकारियों से जवाब मांगा है। India TV की रिपोर्ट के अनुसार नोटिस का जवाब मंगलवार तक देना होगा। साथ ही अदालत ने हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है जिसमें यह दिखाया जाए कि प्रतिबंधों के चरम पर कौन से मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए थे। News18 के अनुसार पीठ ने सरकार के आश्वासनों को रिकॉर्ड पर लिया और एक विस्तृत नक्शा मांगा।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से बहस हुई कि 45 प्रमुख मेट्रो स्टेशनों के बंद होने से आम जनता को भारी परेशानी हुई और शहर भर में आवाजाही ठप पड़ गई। Mathrubhumi की रिपोर्ट के अनुसार वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासात, जिन्हें खुद हिरासत में लिया गया था, ने कहा कि राजधानी मनमाने राज्य नियंत्रण के खतरनाक करीब पहुंच गई थी। अदालत में उन्होंने कहा, "The sense I got was that yesterday we were one step away from a police state," और नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को बहाल करने की मांग की।
वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने दलील दी कि अनुच्छेद 19 के तहत मौलिक अधिकारों को औपचारिक आपातकाल के बिना निलंबित नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ताओं ने यह भी बताया कि दिल्ली भर में 45 से अधिक अस्थायी हिरासत केंद्र बनाए गए थे।
दूसरी ओर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ट्रेन संचालन पूरी क्षमता से चलता रहा, सिर्फ 15 प्रतिशत मेट्रो नेटवर्क पर प्रवेश और निकास प्रतिबंधित था। उन्होंने पीठ को बताया कि अब सभी मेट्रो स्टेशन फिर से खोल दिए गए हैं और इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गई हैं। बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिकाओं पर उन्होंने कहा कि ज्यादातर हिरासत में लिए गए लोगों को दोपहर में उठाया गया और शाम तक छोड़ दिया गया, इसलिए वे प्रार्थनाएं अब निरर्थक हैं।
यहां दोनों पक्षों के दावों में अंतर साफ दिखा। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि 45 प्रमुख स्टेशन बंद किए गए, जबकि सॉलिसिटर जनरल का कहना था कि सिर्फ प्रवेश-निकास पर 15 प्रतिशत नेटवर्क में रोक थी। अदालत ने इस असहमति को हलफनामे और नक्शे से सुलझाने का रास्ता चुना।
अदालत की टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान अदालत ने संवैधानिक दायरे पर भी सवाल उठाया। India TV की रिपोर्ट के अनुसार पीठ ने कहा, "The issue is to what extent the restrictions imposed by the police fall within the ambit of Article 19(2) of the Constitution." साथ ही अदालत ने यह भी साफ किया, "You have the right to protest; there is no dispute over that. However, the manner in which the protest is conducted must be in accordance with the provisions of the Police Act. You cannot claim that your right to protest takes precedence over the Police Act."
न्यायमूर्ति मोहना ने प्रदर्शनकारियों से भी अपील की। India TV के अनुसार उन्होंने कहा, "All of you present here, if you are seriously interested in public welfare, please undertake that you will all protest peacefully and not instigate any other person."
कोर्ट परिसर के बाहर लगा वह नोटिस बोर्ड भी अदालत की नजर में आया जिसमें धारा 163 के तहत सार्वजनिक सभा पर प्रतिबंध की घोषणा थी। Onmanorama की रिपोर्ट के अनुसार पीठ ने निर्देश दिया कि यह बोर्ड हटा दिया जाए ताकि न्याय तक पहुंच बाधित न हो। Mathrubhumi के अनुसार न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि बोर्ड हटना चाहिए "so that citizens as well as lawyers can have access to justice"।
अब आगे क्या होगा
अदालत ने कहा कि वह सभी पक्षों और वकीलों को सुनेगी। अगली सुनवाई मंगलवार को होगी। Onmanorama की रिपोर्ट के अनुसार सामूहिक हिरासत के आरोपों वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं की सुनवाई 13 अक्टूबर को मुख्य मामलों के साथ होगी।
इसी बीच CJP के संस्थापक अभिजीत डिपके, सह-संयोजक सौरव दास और राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रंका को हिरासत के लगभग 24 घंटे बाद विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने रिहा कर दिया था। India TV की रिपोर्ट के अनुसार उन पर BNSS की कई धाराएं लगाई गईं और उन्हें एक साल तक शांति भंग न करने की शर्त पर छोड़ा गया।
अब सबकी नजर मंगलवार की सुनवाई और उस अंतरिम आदेश के सटीक शब्दों पर है, जो तय करेगा कि राजधानी में विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस कितनी दूर जा सकती है और नागरिकों के अधिकार कहां से शुरू होते हैं।
📷 फोटो: Pinakpani, Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)।
Questions people ask
- सुप्रीम कोर्ट ने रविवार की सुनवाई में क्या फैसला किया?
- न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने घोषणा की कि वह अंतरिम आदेश पारित करेगी। इसके तहत दिल्ली मेट्रो और ट्रेनें सामान्य शेड्यूल पर चलेंगी, जनता की आवाजाही बहाल होगी, इंटरनेट में कोई रुकावट नहीं होगी और शांतिपूर्ण जमा हुए लोगों की गैरकानूनी हिरासत नहीं की जाएगी। बैरिकेड हटाने के भी निर्देश दिए गए।
- मेट्रो स्टेशनों को लेकर अदालत ने क्या कहा?
- अदालत ने कहा कि पूर्ण बंदी तभी हो जब कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति पैदा हो। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि 45 स्टेशन बंद किए गए, जबकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ट्रेनें पूरी क्षमता से चलीं और सिर्फ 15 प्रतिशत नेटवर्क पर प्रवेश-निकास प्रतिबंधित था। अदालत ने हलफनामे के साथ बंद स्टेशनों का नक्शा मांगा है।
- किन अधिकारियों को नोटिस जारी हुआ और जवाब कब देना है?
- अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की अवमानना याचिका पर अदालत ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और DMRC अध्यक्ष डी. थारा को नोटिस जारी किया। आरोप है कि अधिकारियों ने 9 अक्टूबर के अदालती निर्देश का उल्लंघन किया। India TV की रिपोर्ट के अनुसार जवाब मंगलवार तक देना होगा।
- आगे क्या होगा, अगली सुनवाई कब है?
- अगली सुनवाई मंगलवार को होगी, जहां अदालत सभी पक्षों को सुनेगी। 13 अक्टूबर को सामूहिक हिरासत के आरोपों वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं की सुनवाई मुख्य मामलों के साथ होगी। शांतिपूर्ण सभा की अनुमति उन्हीं इलाकों में होगी जहां धारा 163 BNSS के प्रतिबंधात्मक आदेश लागू नहीं हैं।
Sources
- News18 — SC To Pass Interim Order After Saturday's Curbs (news18.com)
- Mathrubhumi English — SC directs authorities to prevent illegal detention, restore internet and Metro services (english.mathrubhumi.com)
- India TV — metro services to run normally: SC to Delhi Police (indiatvnews.com)
- Onmanorama — Supreme Court orders restoration of Metro, train services in Delhi (onmanorama.com)
Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.
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