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सुप्रीम कोर्ट: इंटरनेट का इस्तेमाल बच्चों समेत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार — बच्चों पर ब्लैंकेट बैन खारिज

By Gagariya Editorial Desk•18 Oct 2026 IST•4 min read•Human Reviewed & Fact-Checked
सुप्रीम कोर्ट: इंटरनेट का इस्तेमाल बच्चों समेत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार — बच्चों पर ब्लैंकेट बैन खारिज
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क्या फैसला हुआ है

सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि इंटरनेट तक पहुंच और उसका इस्तेमाल हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है — और बच्चे भी इससे अलग नहीं हैं। न्यायमूर्ति जे.बी. पारडीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने 15 अक्टूबर 2026 के आदेश (2026 INSC 1149) में कहा: "इंटरनेट तक पहुंचने और उसका इस्तेमाल करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। हमारे बच्चे, उम्र से निरपेक्ष, इन्हीं अधिकारों के हकदार हैं, और इन्हें पूरी तरह नकारना उतना ही बेतुका होगा जितना यह कहना कि एक निश्चित उम्र से नीचे के बच्चों की कोई अंतरात्मा नहीं होती जिसे बचाने की ज़रूरत हो या अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता नहीं होती जिसे व्यक्त किया जा सके।"

अदालत ने यह भी जोड़ा: "हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं। हमारे बच्चे दोनों के हकदार हैं।" यह फैसला लाइव लॉ और बार एंड बेंच दोनों ने विस्तार से दर्ज किया है।

यह मामला कहां से आया

यह फैसला Just Rights for Children Alliance & Anr. बनाम S. Harish & Ors. (M.A. Nos. 2553–2554 of 2026) मामले में आया, जो आपराधिक अपील Nos. 2161–2162 of 2024 में दायर प्रार्थना-पत्रों से जुड़ा था। असल में अदालत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों और ऑनलाइन सेवाओं पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSEAM) की पहचान और उसे हटाने के निर्देश दे रही थी।

पृष्ठभूमि में अदालत का 23 सितंबर 2024 का फैसला है — Just Rights for Children Alliance बनाम S. Harish — जिसमें मध्यस्थों (intermediaries) को CSEAM की रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। अब याचिकाकर्ताओं ने उसी फैसले के अमल की मांग करते हुए नए प्रार्थना-पत्र दिए थे, जिन पर सुनवाई के दौरान अदालत ने यह अहम टिप्पणी की।

बच्चों पर पूरी तरह प्रतिबंध क्यों खारिज किया

अदालत का तर्क था कि बच्चों को ऑनलाइन खतरों से बचाने के उपाय "हानिकारक सामग्री और उसके लिए ज़िम्मेदार लोगों की ओर लक्षित होने चाहिए, न कि बच्चों की ओर।" लॉ ट्रेंड ने यह अंश दर्ज किया है। एक अन्य रिपोर्ट (News Ei Samay) के अनुसार, अदालत ने कहा कि प्लेटफॉर्मों की नाकामी के कारण बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना "समस्या की जगह पीड़ित को दोषी ठहराने" (mistaking the victim for the problem) जैसा होगा।

इसे और स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा कि बच्चों के इंटरनेट इस्तेमाल पर कोई भी सामान्य (blanket) प्रतिबंध "असंगत उपायों का प्रमाणहीन नमूना" मात्र होगा। यानी प्रतिबंध लगाना आसान है, लेकिन उसका कोई प्रमाणित आधार नहीं है — और वह बच्चों के मौलिक अधिकार से कहीं बड़ा होगा।

तो फिर बच्चों की सुरक्षा कैसे होगी

अदालत ने प्रतिबंध की जगह लक्षित उपाय सुझाए:

  • पैरेंटल कंसेंट के उपाय — बच्चों के ऑनलाइन खातों पर माता-पिता की सहमति की व्यवस्था।
  • डिफ़ॉल्ट चाइल्ड मोड — बच्चों के खातों के लिए निजता-डिफ़ॉल्ट सेटिंग।
  • बेहतर पहचान और हटाने की व्यवस्था — CSEAM जैसी सामग्री को तेज़ी से पहचानकर हटाने वाली मज़बूत प्रणालियां।

साथ ही अदालत ने चेतावनी दी कि कड़ी आयु-सत्यापन व्यवस्था से बच्चों के संवेदनशील निजी डेटा का लगातार संग्रह होगा, जिससे निगरानी (surveillance) का असंगत जोखिम पैदा होगा। यानी सुरक्षा के नाम पर बच्चों की निगरानी भी उतनी ही खतरनाक हो सकती है।

पहले के फैसलों से कैसे जुड़ा है

यह फैसला हवा में नहीं आया है। अदालत ने 2020 के Anuradha Bhasin बनाम Union of India और Pragya Prasun बनाम Union of India मामलों का हवाला दिया और कहा कि इंटरनेट की पहुंच मौलिक अधिकार है, इस सवाल का "अब कोई अनसुलझा पक्ष नहीं बचा है।"

अदालत ने इंटरनेट को "विचारों का बाज़ार" (marketplace of ideas) बताया और कहा कि "कई बच्चों के लिए, खासकर दूर-दराज़ के इलाकों में, यह अक्सर सीखने और जानकारी का एकमात्र स्रोत है।" यह पंक्ति लाइव लॉ और नागालैंड पोस्ट दोनों में दर्ज है।

एक महत्वपूर्ण सीमा भी नोट कीजिए: सोशल मीडिया खातों के लिए 18 वर्ष की न्यूनतम आयु की मांग वाली अलग याचिकाएं अभी लंबित हैं, और केंद्र सरकार ने कहा है कि वह IT नियमों में संशोधन करेगी। यानी आयु-जांच की तकनीकी व्यवस्था अभी खुली है — इस पर अंतिम फैसला आना बाकी है। यह जानकारी particle.news की रिपोर्ट से है।

जानने लायक बातें

  • फैसला 15 अक्टूबर 2026 का है (आदेश संख्या 2026 INSC 1149); खंडपीठ सर्वसम्मत रही — कोई असहमति दर्ज नहीं हुई।
  • इंटरनेट का अधिकार अनुच्छेद 21 और 19(1)(a) दोनों के तहत मौलिक अधिकार घोषित हुआ है।
  • बच्चों की सुरक्षा के नाम पर सामान्य प्रतिबंध अब सीधे संवैधानिक चुनौती का सामना करेंगे — नियामकों को सामग्री-स्तर पर लक्षित उपाय करने होंगे।
  • स्कूलों या सरकारी आदेशों से बच्चों पर लगे इंटरनेट प्रतिबंधों के लिए यह फैसला एक स्पष्ट संवैधानिक बाधा है।

एक मतभेद: आदेश की तारीख को लेकर

फैसले की तारीख को लेकर कवरेज में एक छोटा फर्क दिखा है, बिना किसी सारगर्भित असहमति के। लाइव लॉ, बार एंड बेंच और लॉ ट्रेंड — तीनों ने आदेश की तारीख 15 अक्टूबर 2026 बताई है। वहीं कुछ अन्य रिपोर्टों (जैसे नेशन प्रेस) में इसे 17 अक्टूबर के फैसले के रूप में पेश किया गया है। यह फर्क संभवतः आदेश के अपलोड होने या रिपोर्ट होने की तारीख से जुड़ा है। किसी भी स्रोत ने फैसले के निष्कर्ष या उद्धरणों पर सवाल नहीं उठाया है, इसलिए 15 अक्टूबर 2026 को ही आदेश की तारीख माना जा रहा है।

Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.

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