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RBI ने रेपो रेट बढ़ाया: 5.50%, 2023 के बाद पहली बार

By Gagariya Editorial Desk•7 Oct 2026 IST•5 min read•Human Reviewed & Fact-Checked
RBI ने रेपो रेट बढ़ाया: 5.50%, 2023 के बाद पहली बार
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महंगाई का परिदृश्य अब सौम्य नहीं रहा, यह स्पष्ट है।

गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को नीति का ऐलान करते हुए यह एक वाक्य कहा, और उसी के साथ भारतीय रिज़र्व बैंक ने करीब चार साल बाद ब्याज दरों का चक्र पलट दिया। मौद्रिक नीति समिति के सभी छह सदस्यों ने रेपो रेट में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी के पक्ष में वोट दिया। अब बैंकों को RBI से मिलने वाले कर्ज की दर 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो गई है।

यह वही फैसला था जिसका अंदाज़ा बाज़ार पहले से लगा रहा था। PTI के सर्वेक्षण में अधिकतर प्रतिभागियों को 25 आधार अंक की बढ़ोतरी की उम्मीद थी। गगरीया ने भी 5 अक्टूबर को लिखा था कि RBI 7 अक्टूबर को 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी कर सकता है। बुधवार को वह अनुमान सही साबित हुआ।

फैसला एक नज़र में

गवर्नर मल्होत्रा ने कहा, "विकसित हो रही वृहद आर्थिक और वित्तीय स्थितियों, घटनाक्रमों और परिदृश्य के विस्तृत आकलन के बाद MPC ने नीतिगत रेपो रेट में 25 आधार अंक की वृद्धि के लिए सर्वसम्मति से वोट दिया।"

रेपो रेट के साथ दो और दरें भी बदलीं। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी दर 5.25 प्रतिशत और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी दर तथा बैंक रेट 5.75 प्रतिशत हो गए। कैश रिज़र्व रेश्यो में कोई बदलाव नहीं किया गया, वह 3 प्रतिशत पर बना रहा।

कब क्या हुआ
फरवरी 2023 25 आधार अंक बढ़ोतरी, रेट 6.50 प्रतिशत
2025 (चार बैठकें) कुल 125 आधार अंक की कटौती
फरवरी–अगस्त 2026 (चार बैठकें) कोई बदलाव नहीं, रेट 5.25 प्रतिशत पर स्थिर
7 अक्टूबर 2026 25 आधार अंक बढ़ोतरी, रेट 5.50 प्रतिशत

2025 में चार कटौतियों के बाद RBI ने लगातार चार नीति समीक्षाओं में दरें जस की तस रखी थीं। अगस्त 2026 की बैठक में भी रेट 5.25 प्रतिशत पर रखा गया था और रुख 'तटस्थ' बना रहा था। बुधवार का फैसला उस लंबे इंतज़ार का अंत है।

'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' का मतलब समझिए

दर बढ़ाने के साथ MPC ने अपना रुख भी बदला। 'तटस्थ' की जगह अब 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' अपनाया गया है। RBI के मुताबिक इसका मतलब है महंगाई के उभरते दबाव पर ज़्यादा ध्यान, लेकिन आगे की कार्रवाई के समय और हद को लेकर लचीलापन बरकरार रहेगा।

आसान भाषा में कहें तो RBI ने दरवाज़ा बंद नहीं किया है। ज़रूरत पड़ी तो दिसंबर की बैठक में भी बढ़ोतरी हो सकती है, और हालात सुधरे तो रुक भी सकते हैं। फैसला आंकड़ों पर होगा, पहले से तय नहीं।

विश्लेषकों की राय बंटी हुई है, पर झुकाव एक ही दिशा में है। क्रिसिल की वरिष्ठ अर्थशास्त्री दीप्ति देशपांडे के अनुसार दिसंबर में 25 आधार अंक की और बढ़ोतरी की गुंजाइश दिख रही है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनाविस को इस बैठक में यथास्थिति की उम्मीद थी, पर अब उनका अनुमान है कि मार्च तक नीतिगत दर 6 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

महंगाई ने क्यों मजबूर किया RBI को

अगस्त में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.82 प्रतिशत पहुंच गई, जो जुलाई के 4.45 प्रतिशत से ज़्यादा है। यह लगातार तीसरा महीना है जब महंगाई RBI के 4 प्रतिशत के मध्यम-अवधि लक्ष्य से ऊपर है। सरकार ने RBI को महंगाई 4 प्रतिशत पर रखने का लक्ष्य दिया है, दोनों तरफ 2 प्रतिशत अंक की छूट के साथ।

ईंधन और खाने की ऊंची कीमतें अब अर्थव्यवस्था में फैल रही हैं। उपभोक्ता टोकरी का करीब आधा हिस्सा 4 प्रतिशत से ऊपर की महंगाई झेल रहा है। भोजन, ईंधन और उर्वरक से आ रहा दबाव ही MPC के फैसले की सबसे बड़ी वजह रहा। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार इस तिमाही में महंगाई करीब 5.9 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।

दूसरी तरफ वृद्धि मज़बूत है। अप्रैल-जून तिमाही में अर्थव्यवस्था 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी, जो RBI के 7 प्रतिशत के अनुमान से भी ज़्यादा थी। मज़बूत वृद्धि ने ही केंद्रीय बैंक को कर्ज महंगा करने की गुंजाइश दी। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वृद्धि का अनुमान 6.7 से बढ़ाकर 7.1 प्रतिशत और महंगाई का अनुमान 5.0 से बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया गया।

SBI रिसर्च के अर्थशास्त्रियों ने कहा कि पीछे रहने से बेहतर है पहले कदम उठाना। यानी महंगाई के और बिगड़ने का इंतज़ार करने के बजाय समय रहते कार्रवाई समझदारी है।

दुनिया का दबाव भी भारी

RBI अकेला नहीं है। अमेरिका के फेडरल रिज़र्व ने सितंबर में अपनी दर 25 आधार अंक बढ़ाकर 3.75 से 4 प्रतिशत की सीमा में की, जो 2023 के बाद उसकी पहली बढ़ोतरी थी। यूरोपीय केंद्रीय बैंक ने भी दरें बढ़ाईं, और बैंक ऑफ जापान ने सितंबर में नीतिगत दर 31 साल के उच्चतम स्तर 1.25 प्रतिशत पर पहुंचा दी।

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने कच्चे तेल की कीमतें करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनाए रखी हैं। ऊंचे तेल के दाम, महंगी वैश्विक उधारी और डॉलर की मज़बूती ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंकों के सामने एक ही रास्ता छोड़ा है: महंगाई से पहले लड़ो।

मौसमीय जोखिम भी कम नहीं। कमज़ोर मानसून और अल-नीनो जैसी स्थितियां रबी फसल के लिए खतरा बनी हुई हैं, जिससे खाने की महंगाई और बढ़ सकती है।

आपकी EMI पर क्या असर पड़ेगा

रेपो रेट वह दर है जिस पर RBI बैंकों को कर्ज देता है। इसके बढ़ने का सीधा मतलब है बैंकों के लिए पैसा महंगा होना, और बैंक इसका बोझ आमतौर पर ग्राहकों पर डालते हैं। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ सकती हैं।

लेकिन एक बात ध्यान में रखें। 2025 की कटौतियों का पूरा फायदा कई बैंकों ने ग्राहकों तक पहुंचाया ही नहीं था। ऐसे में हर बैंक तुरंत EMI बढ़ाए, यह ज़रूरी नहीं। जिनके लोन सीधे रेपो रेट से जुड़े हैं, उन पर असर सबसे पहले दिखेगा।

FD करने वालों के लिए यह खबर अच्छी है। जमा दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद बढ़ गई है, क्योंकि बैंकों को अब जमा जुटाने के लिए ज़्यादा ब्याज देना पड़ सकता है।

बैंक ग्राहकों के लिए दो अहम ऐलान

दर के फैसले के साथ RBI ने ग्राहकों की सुविधा के लिए दो अहम उपाय भी घोषित किए। पहला, अकाउंट एग्रीगेटर व्यवस्था में अब NBFC-एग्रीगेटर आपस में जुड़ सकेंगे। ग्राहक किसी भी एग्रीगेटर के ज़रिए अपनी वित्तीय जानकारी देख और साझा कर पाएंगे, किसी एक पर निर्भर नहीं रहना होगा।

दूसरा, सेबी-नियंत्रित डिपॉजिटरीज़ को कंसॉलिडेटेड अकाउंट स्टेटमेंट में बैंक जमा खातों की जानकारी शामिल करने की सुविधा दी जा रही है। यानी बैंक में जमा पैसा और डीमैट होल्डिंग अब एक ही स्टेटमेंट में दिखेंगे। RBI के मुताबिक ये बदलाव 31 दिसंबर 2026 तक लागू होंगे।

आगे क्या देखें

अगली MPC बैठक दिसंबर में है। बाज़ार की नज़र अब दो चीज़ों पर रहेगी: कच्चे तेल की कीमतें और खाने की महंगाई। अक्टूबर की बारिश और रबी बुवाई के आंकड़े भी अहम होंगे।

कैलिब्रेटेड टाइटनिंग का मतलब ही यही है कि RBI हर बैठक में आंकड़े देखकर फैसला करेगा। दिसंबर में कहानी दोहराई जाती है या केंद्रीय बैंक रुकता है, यह महंगाई के रुझान पर निर्भर करेगा। एक बात तय है: सस्ते कर्ज़ का दौर अब पीछे छूट गया है।

Questions people ask

रेपो रेट क्या होता है?
रेपो रेट वह ब्याज दर है जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक कर्ज देता है। जब RBI इसे बढ़ाता है तो बैंकों के लिए पैसा महंगा हो जाता है, और जब घटाता है तो सस्ता। यही दर देश की उधारी लागत की दिशा तय करती है।
रेपो रेट बढ़ने से मेरी EMI क्यों बढ़ सकती है?
रेपो रेट बढ़ने पर बैंकों की लागत बढ़ती है, जिसे वे आमतौर पर कर्जदारों पर डालते हैं। होम, कार और पर्सनल लोन की दरें बढ़ सकती हैं। लेकिन हर बैंक तुरंत EMI नहीं बढ़ाता। जिनके लोन रेपो से जुड़े हैं, उन पर असर पहले दिखता है।
कैलिब्रेटेड टाइटनिंग का क्या मतलब है?
कैलिब्रेटेड टाइटनिंग का मतलब है महंगाई से लड़ने की तैयारी, लेकिन हर कदम आंकड़े देखकर उठाया जाएगा। यह 'तटस्थ' रुख से सख्त संकेत है। दरें और बढ़ सकती हैं, पर यह तय नहीं। RBI ने लचीलापन रखा है ताकि हालात सुधरने पर रुक भी सके।
RBI ने आखिरी बार रेपो रेट कब बढ़ाया था?
इससे पहले RBI ने फरवरी 2023 में रेपो रेट 25 आधार अंक बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत किया था। उसके बाद 2023-24 में दरें स्थिर रहीं, 2025 में चार कटौतियों में कुल 125 आधार अंक घटाए गए, और फिर चार बैठकों तक कोई बदलाव नहीं हुआ।
दिसंबर की बैठक में क्या होगा?
दिसंबर की बैठक में फैसला महंगाई के आंकड़ों, कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक हालात पर निर्भर करेगा। क्रिसिल की दीप्ति देशपांडे को दिसंबर में 25 आधार अंक की और बढ़ोतरी की गुंजाइश दिख रही है। बैंक ऑफ बड़ौदा के मदन सबनाविस का अनुमान है कि मार्च तक दर 6 प्रतिशत पहुंच सकती है।

Sources

  1. Reuters — India raises policy rate by 25 bps in first hike in nearly four years (reuters.com)
  2. ET Now — RBI MPC October 2026: Repo rate hiked 25 bps to 5.50% (etnownews.com)
  3. ANI via Rediff — RBI hikes repo rate by 25 bps to 5.50% (rediff.com)
  4. BusinessLine — RBI MPC Meeting Oct 7 Live updates (thehindubusinessline.com)
  5. IANS via DailyWorld — RBI raises repo rate by 25 bps to 5.50 (dailyworld.in)

Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.

This story is informational only and is not financial advice. Decisions about money belong with a registered adviser — the sources above are a good place to start reading.

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