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रक्षा मंत्रालय के ₹4,106 करोड़ के दो अनुबंध: वायुसेना को GSAT-7C संचार उपग्रह, नौसेना को वरुणास्त्र टॉरपीडो

By Gagariya Editorial Desk•18 Oct 2026 IST•3 min read•Human Reviewed & Fact-Checked
रक्षा मंत्रालय के ₹4,106 करोड़ के दो अनुबंध: वायुसेना को GSAT-7C संचार उपग्रह, नौसेना को वरुणास्त्र टॉरपीडो
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क्या हुआ है

रक्षा मंत्रालय ने 15 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में दो बड़े रक्षा अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिनकी कुल कीमत लगभग ₹4,106 करोड़ (करीब US$ 432 मिलियन) है। हस्ताक्षर अतिरिक्त सचिव और महानिदेशक (अधिग्रहण) ए. अंबारसू की मौजूदगी में हुए। एक अनुबंध भारतीय वायुसेना के लिए GSAT-7C संचार उपग्रह का है और दूसरा भारतीय नौसेना के लिए वरुणास्त्र भारी टॉरपीडो का है। IBEF ने इन विवरणों को मंत्रालय की PIB विज्ञप्ति के हवाले से दर्ज किया है, और ANI ने भी 15 अक्टूबर 2026 को इन्हीं आंकड़ों की खबर दी।

दोनों सौदों को सरकार आत्मनिर्भर भारत और 'मेक इन इंडिया' की दिशा में एक और कदम बता रही है, क्योंकि दोनों हथियार-प्रणालियां स्वदेशी रूप से डिज़ाइन और विकसित की गई हैं।

GSAT-7C क्या है और वायुसेना को क्या मिलेगा

GSAT-7C के लिए ₹2,563 करोड़ का अनुबंध न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL), बेंगलुरु के साथ हुआ है। PIB विज्ञप्ति के अनुसार, यह उपग्रह स्वदेशी रूप से डिज़ाइन, विकसित और निर्मित किया जाएगा और भारतीय वायुसेना की परिसंपत्तियों के लिए सुरक्षित, लचीला और निर्बाध संचार क्षमता उपलब्ध कराएगा। इससे वायुसेना की परिचालन प्रभावशीलता मजबूत होगी।

सरल शब्दों में कहें तो यह वायुसेना का अपना समर्पित संचार उपग्रह होगा — युद्धक विमानों, रडार स्टेशनों और कमान केंद्रों के बीच ऐसी बातचीत जो दुश्मन न तो सुन सके, न बाधित कर सके।

वरुणास्त्र: नौसेना को मिलने वाला स्वदेशी टॉरपीडो

दूसरा अनुबंध ₹1,543 करोड़ का है, जो भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL), हैदराबाद के साथ हुआ है। वरुणास्त्र एक स्वदेशी जहाज़-प्रक्षेपित भारी वजन वाला पनडुब्बी-विरोधी टॉरपीडो है, जिसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की नौसैनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी प्रयोगशाला (NSTL), विशाखापत्तनम ने विकसित किया है।

विज्ञप्ति के अनुसार, वरुणास्त्र में उन्नत चपलता (advanced manoeuvring) की क्षमता है और इसे लंबी दूरी पर दुश्मन की पनडुब्बियों को निशाना बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इससे नौसेना की पनडुब्बी-विरोधी युद्ध क्षमता मजबूत होगी।

दोनों अनुबंध एक नज़र में

विवरण GSAT-7C वरुणास्त्र
अनुबंध मूल्य ₹2,563 करोड़ ₹1,543 करोड़
विक्रेता NSIL, बेंगलुरु BDL, हैदराबाद
विकसित किसने किया स्वदेशी (ISRO/NSIL तंत्र) NSTL (DRDO), विशाखापत्तनम
किस सेवा को मिलेगा भारतीय वायुसेना भारतीय नौसेना
मकसद सुरक्षित सैन्य संचार लंबी दूरी पर पनडुब्बियों को निशाना बनाना

क्या-क्या घोषित नहीं हुआ

पारदर्शिता की दृष्टि से यह बताना ज़रूरी है कि सरकारी विज्ञप्ति में दो अहम बातें नहीं बताई गईं। एक, GSAT-7C को कब प्रक्षेपित किया जाएगा — इसकी कोई समयसीमा नहीं दी गई। दो, BDL को कितने वरुणास्त्र टॉरपीडो का ऑर्डर दिया गया — टॉरपीडो की संख्या घोषित नहीं की गई। मीडिया में टॉरपीडो के वजन (1,850 किलोग्राम), गति (40 नॉट) और रेंज (~40 किमी) जैसे आंकड़े कुछ रिपोर्टों में दिखे हैं, लेकिन ये सरकारी विज्ञप्ति का हिस्सा नहीं हैं, इसलिए इन्हें पुष्ट तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।

निष्कर्ष नहीं, तथ्य: जानने लायक बातें

  • दोनों अनुबंधों की कुल कीमत ₹4,106 करोड़ है — लगभग US$ 432 मिलियन, जैसा कि IBEF ने PIB विज्ञप्ति के हवाले से लिखा है।
  • GSAT-7C वायुसेना को समर्पित सुरक्षित संचार उपग्रह देगा; वरुणास्त्र नौसेना की पनडुब्बी-विरोधी क्षमता बढ़ाएगा।
  • दोनों प्रणालियां स्वदेशी हैं — उपग्रह NSIL के माध्यम से और टॉरपीडो DRDO की NSTL प्रयोगशाला द्वारा विकसित।
  • वरुणास्त्र का निर्माण BDL, हैदराबाद करेगी; उपग्रह का काम NSIL, बेंगलुरु संभालेगा।
  • प्रक्षेपण की तारीख और टॉरपीडो की संख्या फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है — ये दोनों सवाल अभी खुले हैं।

Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.

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