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फॉर्म-7 पर आयोग की लगाम: एक व्यक्ति सिर्फ 10 आपत्ति दे सकेगा

By Gagariya Editorial Desk•10 Oct 2026 IST•5 min read•Human Reviewed & Fact-Checked
फॉर्म-7 पर आयोग की लगाम: एक व्यक्ति सिर्फ 10 आपत्ति दे सकेगा
Photo: Own or licensed by the publisher

एक व्यक्ति। पूरी दावा-आपत्ति अवधि में। ज्यादा से ज्यादा दस फॉर्म-7। चुनाव आयोग ने शुक्रवार को इसे लेकर निर्देश जारी कर दिया।

वोटर लिस्ट से नाम कटवाने के लिए इस्तेमाल होने वाला फॉर्म-7 अब थोक में नहीं भरा जा सकेगा। आयोग का कहना है कि उसे ऐसी शिकायतें मिली थीं कि कुछ लोग बिना ठोस आधार के बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल कर रहे थे। इससे जिन मतदाताओं के नाम पर आपत्ति होती थी, उन्हें परेशानी होती थी और मैदान में काम करने वाले अधिकारियों का बोझ भी बढ़ता था।

फॉर्म-7 है क्या

मतदाता सूची से जुड़े ज्यादातर कामों के अपने-अपने फॉर्म हैं। फॉर्म-7 उस काम का है जिससे कोई व्यक्ति सूची में किसी नाम के शामिल होने पर आपत्ति कर सके या किसी का नाम हटाने की मांग कर सके।

यह फॉर्म कोई भी नहीं भर सकता। निर्वाचक नामावली पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 13(2) के तहत यह फॉर्म सिर्फ वही व्यक्ति दे सकता है, जिसका नाम उसी विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में पहले से दर्ज हो। यानी पड़ोसी क्षेत्र का कोई आदमी आकर आपके क्षेत्र की सूची में आपत्ति नहीं दाखिल कर सकता।

आयोग ने मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के बूथ स्तर एजेंटों (बीएलए) के लिए अलग सीमा पहले से तय कर रखी है। प्रारूप मतदाता सूची के प्रकाशन से पहले वे रोज 50 फॉर्म दे सकते हैं, और उसके बाद रोज 10।

कर्नाटक से शुरू हुआ विवाद

इस निर्देश की पृष्ठभूमि में एक हालिया विवाद है। कर्नाटक में मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) के दौरान फॉर्म-7 के थोक में दाखिल होने की शिकायतें आईं।

मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने आरोप लगाया कि भाजपा से जुड़े लोग योग्य मतदाताओं के नाम हटवाने की कोशिश कर रहे थे और उन्होंने आपराधिक जांच की मांग की। कई निर्वाचन क्षेत्रों में कथित गलत या जाली आवेदन को लेकर एफआईआर भी दर्ज हुईं। हालांकि, कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा कि प्राप्त आपत्तियों के आधार पर किसी मतदाता का नाम हटाया नहीं गया था।

टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, कांग्रेस ने राज्य के कई निर्वाचन क्षेत्रों में थोक फॉर्म-7 भरने की बात उठाई, जिसमें बल्लारी का मामला भी शामिल है। वहां कथित तौर पर भाजपा के एक कार्यकर्ता ने अकेले 7,561 फॉर्म-7 जमा किए थे।

हिंदुस्तान टाइम्स के मुताबिक, तेलंगाना में भी कांग्रेस ने 1 अक्टूबर को हैदराबाद के मुशीराबाद में मामला उठाया। कांग्रेस का आरोप था कि भाजपा के एक बूथ स्तर एजेंट ने एक ही मुस्लिम परिवार के सदस्यों के नाम हटवाने के लिए 30 से ज्यादा फॉर्म-7 दाखिल किए थे। उसी अखबार के अनुसार, बहादुरपुरा और गोशामहल निर्वाचन क्षेत्रों में भी पहले से भरे हुए फॉर्म मिले थे, जिनमें आवेदक का ब्योरा खाली छोड़ दिया गया था। हिंदुस्तान टाइम्स के ही अनुसार राजस्थान से भी ऐसे दुरुपयोग की खबरें आई थीं, जबकि टाइम्स नाउ की खबर में कर्नाटक के साथ ओडिशा का भी जिक्र है।

आयोग की नई व्यवस्था क्या कहती है

आयोग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को जो चिट्ठी लिखी है, उसमें दो सीमाएं साफ हैं। दावा-आपत्ति अवधि के दौरान एक व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा 10 फॉर्म-7 दे सकता है। जब सूची का लगातार अद्यतनीकरण चल रहा हो, तब हर महीने पांच फॉर्म की सीमा रहेगी।

यह सीमा ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों तरीकों पर एक जैसी लागू होगी। आयोग ने बताया कि पहले ऑनलाइन फॉर्म एक बार में छह तक ही भरे जा सकते थे, लेकिन भौतिक रूप से बंडल में दिए जाने वाले फॉर्मों की कोई संख्या तय नहीं थी। यह निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों के विवेक पर छोड़ दिया गया था, जिससे मैदान में काम करने वालों के सामने दिक्कत आ रही थी। डेक्कन हेराल्ड के अनुसार आयोग के एक अधिकारी ने कहा कि इसी अनिश्चितता की वजह से बदलाव जरूरी हो गया था।

फॉर्मों की जांच का तरीका भी निर्देश में विस्तार से बताया गया है। निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी को आवेदक की पहचान सत्यापित करनी होगी, यह देखना होगा कि फॉर्म पूरा है और उस पर आपत्तिकर्ता के असली हस्ताक्षर हैं। मुहर हस्ताक्षर की जगह नहीं ले सकती।

जहां मामला सुनवाई तक पहुंचता है, वहां अधिकारी पहले आपत्तिकर्ता को नोटिस देगा, हर फॉर्म के लिए अलग-अलग उसकी सुनवाई करेगा और फिर आदेश देने से पहले उस मतदाता को भी सुनने का मौका देगा, जिसके नाम को चुनौती दी गई है। निपटारा निर्वाचक नामावली पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 19 और 20 के तहत होगा। अगर कोई आवेदन झूठा या गढ़ा हुआ पाया जाता है तो जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 31 के तहत कार्रवाई होगी, जिसमें झूठे बयान पर दंड का प्रावधान है।

पहले क्या था, अब क्या होगा

पहलू पहले की स्थिति अब की व्यवस्था
एक व्यक्ति कितने फॉर्म दे सकता था ऑनलाइन एक बार में छह तक; भौतिक फॉर्मों की कोई संख्या तय नहीं थी दावा-आपत्ति अवधि में कुल 10, लगातार अद्यतनीकरण में हर महीने 5
भौतिक फॉर्मों पर सीमा तय नहीं, निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के विवेक पर ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों पर एक जैसी सीमा
आपत्तिकर्ता की पहचान जांच का कोई तयशुदा सिलसिला नहीं था पहचान सत्यापन, असली हस्ताक्षर अनिवार्य, मुहर नहीं चलेगी
सुनवाई हर जगह एक जैसी प्रक्रिया नहीं थी आपत्तिकर्ता को नोटिस, हर फॉर्म पर अलग सुनवाई, चुनौती पाने वाले मतदाता को भी मौका
झूठी आपत्ति पर कार्रवाई नियम मौजूद थे जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 31 के तहत कार्रवाई का निर्देश
बीएलए की सीमा प्रारूप सूची से पहले रोज 50, बाद में रोज 10 यही सीमा जारी रहेगी

सियासी पृष्ठभूमि

यह फैसला ऐसे समय आया है जब मतदाता सूचियों के विशेष गहन संशोधन को लेकर विपक्षी दल अनियमितताओं का आरोप लगा रहे हैं। टाइम्स नाउ के अनुसार आयोग का यह कदम विपक्षी दलों के इसी अभियान के बीच उठा है।

आयोग की चिट्ठी में विपक्ष के आरोपों का कोई जवाब नहीं है। उसने सिर्फ इतना कहा है कि थोक में और बिना ठोस आधार के दाखिल आपत्तियों से मतदाताओं को परेशानी होती है और अधिकारियों का काम बढ़ता है। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का यह बयान कि आपत्तियों के आधार पर किसी का नाम हटाया नहीं गया, इसी क्रम में आता है।

आगे क्या देखना है

निर्देश के बाद अब निगाह राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों पर होगी, जिन्हें इसे निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों, सहायक अधिकारियों और मैदान के कर्मचारियों तक पहुंचाना है और इसका पर्याप्त प्रचार भी करना है।

देखने वाली बात यह होगी कि नई सीमा के बाद थोक आपत्तियों की शिकायतें कितनी घटती हैं, और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी हर फॉर्म पर अलग सुनवाई वाले नियम को कितनी सख्ती से लागू करते हैं। एसआईआर चल रहे राज्यों में यह नई व्यवस्था दावा-आपत्ति की खिड़की के दौरान परखी जाएगी।

Questions people ask

फॉर्म-7 किस काम आता है?
फॉर्म-7 से कोई व्यक्ति मतदाता सूची में किसी नाम के शामिल होने पर आपत्ति कर सकता है या किसी का नाम हटाने की मांग कर सकता है। यह फॉर्म सिर्फ वही भर सकता है जिसका नाम उसी विधानसभा क्षेत्र की सूची में पहले से दर्ज हो। बूथ स्तर एजेंटों के लिए अलग सीमा तय है।
नई सीमा के बाद एक व्यक्ति कितने फॉर्म-7 दे सकता है?
दावा-आपत्ति अवधि के दौरान एक व्यक्ति कुल मिलाकर ज्यादा से ज्यादा 10 फॉर्म-7 दे सकता है। जब सूची का लगातार अद्यतनीकरण चल रहा हो, तब हर महीने पांच फॉर्म की सीमा रहेगी। यह पाबंदी ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों तरीकों से दाखिल फॉर्मों पर एक जैसी लागू होगी।
झूठी आपत्ति देने पर क्या कार्रवाई होगी?
निर्देश के अनुसार निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी पहले आपत्तिकर्ता को नोटिस देगा और हर फॉर्म पर अलग से उसकी सुनवाई करेगा। अगर आवेदन झूठा या गढ़ा हुआ पाया जाता है तो जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 31 के तहत कार्रवाई होगी, जिसमें झूठे बयान या घोषणा पर दंड का प्रावधान है।
क्या मेरा नाम बिना बताए वोटर लिस्ट से हटाया जा सकता है?
निर्देश के मुताबिक आदेश देने से पहले उस मतदाता को सुनने का मौका देना जरूरी है, जिसके नाम को चुनौती दी गई है। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने यह भी कहा था कि प्राप्त आपत्तियों के आधार पर किसी मतदाता का नाम हटाया नहीं गया था।
चुनाव आयोग ने यह फैसला क्यों लिया?
आयोग का कहना है कि उसे बिना ठोस आधार के थोक में आपत्तियां दाखिल होने की शिकायतें मिली थीं, जिससे चुनौती पाए मतदाताओं को परेशानी होती थी और अधिकारियों का बोझ बढ़ता था। कर्नाटक और तेलंगाना में फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग की खबरों के बाद यह निर्देश जारी किया गया।

Sources

  1. NDTV (ndtv.com)
  2. Hindustan Times (hindustantimes.com)
  3. Times Now (timesnownews.com)
  4. Deccan Herald (deccanherald.com)
  5. Times of India (timesofindia.indiatimes.com)

Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.

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