हिंदुस्तान जिंक: CBI ने क्लोजर रिपोर्ट दायर की

चौबीस साल पुराना एक सौदा, दो दौर की जांचें, और आखिर में वही नतीजा। केंद्रीय जांच ब्यूरो ने 2002 के हिंदुस्तान जिंक विनिवेश मामले में क्लोजर रिपोर्ट दायर कर दी है। पीटीआई की 9 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, एजेंसी के अधिकारियों का कहना है कि एफआईआर में लगाए गए आरोप जांच के दौरान साबित नहीं हो पाए। उनके शब्दों में, तथ्य किसी संज्ञेय अपराध का होना साबित नहीं करते।
यह वही मामला है जिसमें कभी सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध' बनता देखा था और पूरी जांच के आदेश दिए थे। अब क्लोजर रिपोर्ट के बाद गेंद विशेष अदालत के पाले में है। अदालत या तो रिपोर्ट स्वीकार कर लेगी, या फिर आगे की जांच के आदेश देगी।
₹445 करोड़ में 26 फीसदी हिस्सेदारी
साल 2002 था। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार देश के सरकारी उपक्रमों के विनिवेश की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। उस दौर में विनिवेश मंत्री के तौर पर अरुण शौरी इस प्रक्रिया की बागडोर संभाले थे — यह एक आउटलेट की रिपोर्ट में दर्ज है।
हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड दरअसल एक पुरानी कंपनी है। 1944 में इसकी शुरुआत मेटल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के तौर पर हुई थी, 1976 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ, और 1991-92 में सरकार ने पहली बार इसकी 24.08 फीसदी हिस्सेदारी बाजार में बेची। इसके बाद सरकार के पास कंपनी में 75.92 फीसदी हिस्सेदारी बची रह गई।
फिर आया 2002। 4 अप्रैल 2002 को सरकार ने स्टरलाइट ऑपरच्युनिटीज़ एंड वेंचर्स लिमिटेड (एसओवीएल) के साथ शेयरधारक समझौता और शेयर खरीद समझौता किया। इकनॉमिक टाइम्स की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, 26 फीसदी हिस्सेदारी ₹445 करोड़ में बेची गई, और यह कीमत तय हुई ₹40.50 प्रति शेयर के भाव से। इसके छह दिन बाद, 10 अप्रैल 2002 को एसओवीएल ने खुले बाजार से 20 फीसदी और हिस्सेदारी ली, और नवंबर 2003 में 18.92 फीसदी का पहला कॉल ऑप्शन इस्तेमाल किया। इस तरह स्टरलाइट की कुल हिस्सेदारी 64.92 फीसदी हो गई, और सरकार की हिस्सेदारी घटकर 49.92 फीसदी रह गई। सरकार अब कंपनी में बहुसंख्यक हिस्सेदार नहीं रही। कंपनी बाद में वेदांता की सहायक कंपनी बन गई, जिसकी पुष्टि वेदांता के 2021 के शेयर बाजार फाइलिंग में होती है।
2013 से 2022: जांच की टेढ़ी राह
कहानी 2002 पर खत्म नहीं हुई। 2013 में एक जनहित याचिका दायर हुई, जिसमें सौदे में अनियमितताओं का आरोप लगा। 6 नवंबर 2013 को सीबीआई ने प्रारंभिक जांच शुरू की। मार्च 2017 में एजेंसी ने जांच बंद करने का फैसला लिया, लेकिन इस फैसले के पीछे खुद एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारियों, प्रॉसिक्यूटरों और जांच अधिकारी के बीच गहरा मतभेद था। कुछ अधिकारी बंद करने के पक्ष में थे, कुछ रेगुलर केस दर्ज करने पर अड़े थे।
फिर 2014 में नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑफिसर्स एसोसिएशन ऑफ सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइज़ेज़ ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इसमें विनिवेश को चुनौती दी गई और अनियमितताओं का आरोप लगाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने 18 नवंबर 2021 के अपने फैसले में सीबीआई की फाइलों को खंगाला और पाया कि जांच बंद करने के फैसले के पीछे एकमत नहीं था। तत्कालीन चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि सीबीआई अधिकारियों की टिप्पणियां इस अदालत को अपने विशेषाधिकार इस्तेमाल करने के लिए संतुष्ट करती हैं। अदालत ने कहा कि 'संज्ञेय अपराध के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है' और सीबीआई को रेगुलर केस दर्ज करके पूरी जांच करने का आदेश दिया। यहां एक तारीख का फर्क भी दर्ज है — पीटीआई की ताज़ा रिपोर्ट में इस आदेश का ज़िक्र 2022 के संदर्भ में है, जबकि इंडियन एक्सप्रेस और फैसले के रिकॉर्ड के मुताबिक यह नवंबर 2021 का आदेश था। इस आदेश के बाद 28 अप्रैल 2022 को एफआईआर दर्ज हुई।
| साल | घटना |
|---|---|
| 1944 | मेटल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के तौर पर कंपनी की स्थापना |
| 1976 | कंपनी का राष्ट्रीयकरण, बनी हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड |
| 1991-92 | सरकार ने 24.08 फीसदी हिस्सेदारी बेची, बची 75.92 फीसदी |
| 4 अप्रैल 2002 | एसओवीएल के साथ समझौते, 26 फीसदी हिस्सेदारी ₹445 करोड़ में बेची |
| नवंबर 2003 | एसओवीएल की कुल हिस्सेदारी 64.92 फीसदी हुई |
| नवंबर 2013 | सीबीआई ने प्रारंभिक जांच शुरू की |
| मार्च 2017 | प्रारंभिक जांच बंद, लेकिन अधिकारियों में मतभेद |
| 18 नवंबर 2021 | सुप्रीम कोर्ट ने रेगुलर केस का आदेश दिया |
| 28 अप्रैल 2022 | सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की |
| 9 अक्टूबर 2026 | सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट दायर की |
अदालत ने क्यों कहा था — जांच ज़रूरी है
सुप्रीम कोर्ट ने 2021 के फैसले में मूल्यांकन पर गंभीर सवाल उठाए थे। अदालत के मुताबिक, सीबीआई की प्रारंभिक जांच के दौरान जिन विशेषज्ञों — चार्टर्ड इंजीनियरों — से राय ली गई थी, उन्होंने कहा था कि मूल्यांकन 'लोअर साइड' पर था, यानी कंपनी का मूल्यांकन कम आंका गया था, और इसमें प्रासंगिक खनन संपत्तियां शामिल नहीं की गई थीं।
आदेश में दर्ज है कि कथित तौर पर अगर डीसीएफ पद्धति से सही मूल्यांकन होता, तो प्रति शेयर मूल्य ₹1,000 से अधिक होता, जबकि सौदा ₹40.50 प्रति शेयर के भाव पर हुआ था। अदालत ने यह भी नोट किया कि 9 जनवरी 2002 को बीएनपी परिबा को 'ग्लोबल एडवाइज़र' नियुक्त किया गया था, लेकिन जांच के दौरान बैंक के अधिकारियों का पता ही नहीं चल सका। अदालत ने बताया कि बीएनपी परिबा इक्विटीज़ इंडिया प्राइवेट लिमिटेड का स्वैच्छिक समापन 5 सितंबर 2001 को ही हो चुका था।
इतना ही नहीं, आदेश के मुताबिक मूल्यांकनकर्ताओं ने कथित तौर पर कई संपत्तियों को ध्यान में ही नहीं लिया। इनमें विभिन्न खदानों में 150 मिलियन टन अयस्क भंडार शामिल थे, जिनका मूल्य ₹80,000 करोड़ आंका गया था; आंध्र प्रदेश गैस पावर में सरकार का करीब ₹83 करोड़ का निवेश; ₹175 करोड़ का अग्रिम आयकर; करीब ₹20,000 करोड़ की संपत्तियां; और ₹600 करोड़ का स्क्रैप। अदालत के आदेश के अनुसार, उस समय सीसा-जिंक खनिज का मूल्य ₹66,292 करोड़ था, और 40 फीसदी निष्कर्षण लागत हटाने के बाद भी यह करीब ₹39,000 करोड़ बैठता था। बावजूद इसके, मूल्यांकनकर्ता ने अयस्क भंडार का मूल्य महज ₹748.88 करोड़ लगाया था।
ये आंकड़े वही हैं जो 2017 में प्रारंभिक जांच बंद करने का विरोध करने वाले सीबीआई अधिकारियों ने रखे थे।
क्लोजर रिपोर्ट का मतलब क्या है
यह समझना ज़रूरी है कि क्लोजर रिपोर्ट का मतलब आरोपियों को निर्दोष ठहराना नहीं होता। यह सीबीआई का कहना है कि जांच के बाद उसे आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले। अब विशेष अदालत इस रिपोर्ट पर सीबीआई की दलीलें सुनेगी, और फिर तय करेगी कि रिपोर्ट स्वीकार की जाए या आगे जांच के आदेश दिए जाएं।
यह भी याद रखना चाहिए कि 2017 में भी सीबीआई ने एक बार जांच बंद की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे पलटकर पूरी जांच के आदेश दे दिए थे। इसलिए मामला अब पूरी तरह खत्म मानना जल्दबाज़ी होगी।
अब आगे क्या होगा
विशेष अदालत की सुनवाई अब इस मामले की दिशा तय करेगी। अगर अदालत रिपोर्ट स्वीकार कर लेती है, तो 24 साल से चली आ रही इस कानूनी लड़ाई पर विराम लग जाएगा। अगर अदालत आगे जांच के आदेश देती है, तो मामला फिर जांच के दायरे में आएगा।
इस बीच सरकार के पास हिंदुस्तान जिंक की 29.54 फीसदी बची-खुची हिस्सेदारी भी है, जिसे बेचने की इजाज़त सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में ही दे दी थी। इंडियन एक्सप्रेस की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक उस समय इस हिस्सेदारी का अनुमानित मूल्य ₹40,000 करोड़ आंका गया था। यह हिस्सा अब सीबीआई जांच से अलग है, लेकिन इस कहानी का एक और खुला अध्याय ज़रूर है।
📷 फोटो: Bluerasberry, Wikimedia Commons (CC BY-SA 4.0)
Questions people ask
- हिंदुस्तान जिंक का 2002 वाला विनिवेश मामला क्या था?
- 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने हिंदुस्तान जिंक की 26 फीसदी हिस्सेदारी स्टरलाइट ऑपरच्युनिटीज़ एंड वेंचर्स लिमिटेड को ₹445 करोड़ में बेची थी। आरोप लगा कि शेयरों का मूल्यांकन कम किया गया और डीसीएफ पद्धति से मूल्य ₹1,000 प्रति शेयर से अधिक बनता था, जबकि सौदा ₹40.50 के भाव पर हुआ।
- सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट क्यों दायर की?
- पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सीबीआई अधिकारियों का कहना है कि 2022 में दर्ज एफआईआर के आरोप जांच में साबित नहीं हो पाए। एजेंसी के मुताबिक तथ्य किसी संज्ञेय अपराध का होना नहीं दर्शाते। इसलिए एजेंसी ने विशेष अदालत में क्लोजर रिपोर्ट दायर की है, जिस पर अब अदालत फैसला करेगी।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या कहा था?
- सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2021 के फैसले में कहा था कि संज्ञेय अपराध का प्रथम दृष्टया मामला बनता है और सीबीआई को रेगुलर केस दर्ज करके पूरी जांच करनी चाहिए। अदालत ने मूल्यांकन पर सवाल उठाए थे, जिनमें डीसीएफ पद्धति से ₹1,000 से अधिक प्रति शेयर का अनुमान और ₹748.88 करोड़ के अयस्क मूल्यांकन का हवाला था।
- क्या अब मामला पूरी तरह खत्म हो गया?
- नहीं। क्लोजर रिपोर्ट के बाद विशेष अदालत फैसला करेगी कि रिपोर्ट स्वीकार की जाए या आगे जांच के आदेश दिए जाएं। 2017 में भी सीबीआई ने एक बार जांच बंद की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे पलट दिया था। इसलिए मामला पूरी तरह खत्म मानना अभी जल्दबाज़ी होगी।
Sources
- ThePrint (PTI): 'Allegations not substantiated': CBI files closure report in 2002 Hindustan Zinc disinvestment (theprint.in)
- Rediff (PTI): Hindustan Zinc Disinvestment: CBI Files Closure Report Despite SC Directive (rediff.com)
- Indian Express: Explained — Why has SC ordered a CBI probe into 2002 Hindustan Zinc Limited disinvestment? (indianexpress.com)
- Economic Times: SC asks CBI to probe 2002 sale of HZL shares to Sterlite (economictimes.indiatimes.com)
Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.
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