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GST परिषद: गिरफ्तारी का अधिकार खत्म करने पर विचार

By Gagariya Editorial Desk•6 Oct 2026 IST•6 min read•Human Reviewed & Fact-Checked
GST परिषद: गिरफ्तारी का अधिकार खत्म करने पर विचार
Photo: Own or licensed by the publisher

सात अक्टूबर को जीएसटी परिषद की 57वीं बैठक में एक बड़ा प्रस्ताव रखा जाएगा — कर अधिकारियों के पास करदाता को गिरफ्तार करने की शक्ति न रहे, और कोई भी गिरफ्तारी अदालत की अनुमति से ही हो।

2017 में जीएसटी लागू होते समय कानून में जो सख्त प्रावधान रखे गए, उन्हें अब ढीला करने की तैयारी दिख रही है। रोलआउट को नौ साल से ज्यादा हो चुके हैं। सरकार का तर्क है कि अब तकनीक खुद गड़बड़ी पकड़ लेती है, इसलिए गिरफ्तारी जैसी धाराओं की जरूरत नहीं रह गई।

मेज पर क्या-क्या है

बैठक का एजेंडा गिरफ्तारी से कहीं बड़ा है। समाचार एजेंसी एएनआई को वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि अनुपालन सुधारों का पूरा पैकेज विचाराधीन है — इनपुट टैक्स क्रेडिट का दायरा बढ़ाना, रिफंड तेज करना, छोटे कारोबारियों और ई-कॉमर्स विक्रेताओं के लिए राहतें।

मुख्य प्रस्ताव एक नजर में:

प्रस्ताव मौजूदा स्थिति
कर अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्ति हटाना आयुक्त की मंजूरी पर अधिकारी गिरफ्तारी कर सकता है (धारा 69)
अभियोजन की सीमा ₹1 करोड़ से बढ़ाकर ₹5 करोड़ ₹1 करोड़ से ऊपर के मामलों में मुकदमा
24 में से 9 अपराध अपराध-श्रेणी से पूरी तरह हटाना, एक आंशिक उल्लंघन पर आपराधिक कार्रवाई का दायरा बड़ा
न्यूनतम जेल की सजा हटाकर जुर्माने का विकल्प न्यूनतम सजा तय
ईमानदार खरीदार का आईटीसी सुरक्षित ऊपर का सप्लायर डिफॉल्ट करे तो खरीदार का क्रेडिट खतरे में

गिरफ्तारी की शक्ति अभी कैसे काम करती है

केंद्रीय जीएसटी कानून की धारा 69 के तहत आयुक्त किसी अधिकारी को गिरफ्तारी की अनुमति तभी देता है, जब उसके पास यह मानने के ठोस कारण हों कि व्यक्ति ने फर्जी चालान जारी करने या गलत तरीके से इनपुट टैक्स क्रेडिट लेने जैसा अपराध किया है। कारण विश्वसनीय सबूतों पर टिके होने चाहिए, सिर्फ शक काफी नहीं। हर कारण लिखित में दर्ज करना अनिवार्य है।

यह शक्ति वैसे भी बड़े मामलों तक सीमित है — कुल ₹2 करोड़ या उससे ज्यादा की कर चोरी। गंभीर अपराधों में बिना चालान के सप्लाई, बिना सप्लाई के चालान जारी करना, वसूला गया कर सरकार को न देना और माल या सेवा लिए बिना आईटीसी लेना शामिल है।

कर बोर्ड सीबीआईसी ने अपने दस्तावेज में इस प्रावधान का बचाव किया है। उसका कहना है कि कुछ लोगों को ये धाराएं कठोर लग सकती हैं, लेकिन कर प्रशासन को ठीक से चलाने और अनुशासन बनाए रखने के लिए ये जरूरी हैं, और इनसे नियमों के पालन का डर पैदा होता है।

बदलाव की मांग क्यों उठी

उद्योग जगत लंबे समय से कह रहा है कि गिरफ्तारी की धाराएं डराने का हथियार बन गई हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक हाल के दिनों में कुछ बड़े अधिकारियों की गिरफ्तारी के बाद यह मामला और गर्म हो गया। विशेषज्ञों का कहना है कि सेवा क्षेत्र, खासकर बैंकिंग और बीमा में, गिरफ्तारी का इस्तेमाल अक्सर दबाव बनाकर जुर्माना वसूलने के लिए हुआ।

आंकड़े भी इस बहस के साथ हैं। 2021-22 से 2024-25 के बीच केंद्रीय जीएसटी इकाइयों ने 72,393 मामलों में 887 गिरफ्तारियां कीं। राज्य प्राधिकरणों की गिरफ्तारियां इसके अलग हैं।

वित्त मंत्रालय के अधिकारी ने एएनआई से कहा कि 2017 में कानून में जो सुरक्षा कवच रखे गए थे, उन्हें अब ढीला किया जा सकता है, क्योंकि व्यवस्था अब गड़बड़ी खुद पकड़ने में सक्षम हो गई है। अधिकारी के शब्दों में, "फर्जी क्रेडिट अब वहीं पकड़ा जा सकता है, जहां से वह शुरू होता है, इससे पहले कि वह श्रृंखला में आगे बढ़े।"

इनवॉइस-मैचिंग सिस्टम विक्रेता की रिपोर्ट को खरीदार के आईटीसी दावे से जोड़ता है। इनपुट-आउटपुट खातों का सारांश रिटर्न से मिलान पूरी कड़ी तैयार कर देता है। यही तकनीकी भरोसा गिरफ्तारी की धाराओं को हटाने का आधार बताया जा रहा है।

एएमआरजी ग्लोबल के प्रबंध भागीदार रजत मोहन ने पीटीआई से कहा, "गिरफ्तारी हटने और अभियोजन गंभीर मामलों तक सीमित रहने से अब ध्यान जबरदस्ती की शक्तियों की बजाय जीएसटीएन की डेटा क्षमता से धोखाधड़ी पकड़ने पर बढ़ेगा।"

यह बहस नई नहीं है। दिसंबर 2016 में पांचवीं जीएसटी परिषद बैठक में महाराष्ट्र के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने कहा था कि गिरफ्तारी और जब्ती की शक्तियां कारोबार सुगमता की भावना से मेल नहीं खातीं। पश्चिम बंगाल के मंत्री ने याद दिलाया था कि पुराने वैट कानून में गिरफ्तारी का प्रावधान था ही नहीं, एफआईआर सिर्फ पुलिस के पास दर्ज होती थी।

ईमानदार कारोबारी के लिए क्या राहतें

अधिकारी वर्ग से आई जानकारी के मुताबिक ईमानदार खरीदार को सबसे बड़ी राहत मिल सकती है। वैध चालान रखने और सप्लायर को भुगतान करने वाला खरीदार अपना आईटीसी बचा सकेगा, भले ही श्रृंखला में ऊपर का सप्लायर डिफॉल्ट कर जाए। वसूली उसी डिफॉल्टर के खिलाफ होगी। जानबूझकर धोखाधड़ी में शामिल पाए गए खरीदारों पर कार्रवाई जारी रहेगी।

आईटीसी का दायरा भी बढ़ने की संभावना है। कर्मचारियों के लिए नियोक्ता द्वारा लिया गया स्वास्थ्य और जीवन बीमा, 13 सीट तक के वाहन और उनसे जुड़ा बीमा, सर्विसिंग व लीजिंग, टेलीकॉम टावर, फैक्ट्री के बाहर बिछी पाइपलाइन, मुफ्त नमूने और कानूनन नष्ट किया गया एक्सपायरी माल — इन श्रेणियों में क्रेडिट पर लगी रोक हट सकती है।

रिफंड की प्रक्रिया भी तेज होने के आसार हैं। सेवाओं और प्लांट-मशीनरी पर चुकाया गया कर रिफंड के दायरे में आ सकता है। प्लांट-मशीनरी का रिफंड पांच साल में बंटेगा। दावा 10 दिन में स्वीकार करना होगा, और अगर अधिकारी तय समय में कार्रवाई न करे तो दावा स्वीकार माना जाएगा। जोखिम आकलन के बाद 90 फीसदी राशि स्वतः जारी होगी, बाकी सत्यापन के बाद।

छोटे कारोबारियों पर बोझ कम करने के लिए ₹10,000 से कम की राशि पर कोई कारण-बताओ नोटिस जारी न करने का प्रस्ताव है। 2017 से ऐसे करीब 11.3 लाख नोटिस जारी हो चुके हैं। पांच करोड़ तक के टर्नओवर वाले और सिर्फ अनरजिस्टर्ड ग्राहकों को सप्लाई करने वाले करदाताओं के लिए वैकल्पिक सालाना रिटर्न और तिमाही कर भुगतान का रास्ता खुल सकता है। छोटे करदाताओं की लेट फीस माफ होने की भी उम्मीद है।

छोटे ई-कॉमर्स विक्रेताओं को अपने होम स्टेट में एक बार सत्यापन के बाद दूसरे राज्यों में प्लेटफॉर्म के गोदाम को कारोबार स्थल के रूप में इस्तेमाल की छूट मिल सकती है। पीटीआई के सूत्रों के मुताबिक करीब 9.5 लाख छोटे विक्रेताओं को इससे बाजार तक पहुंच आसान होगी।

खबरों में बारीक अंतर

दोनों खबरों में धुन एक है, शब्द थोड़े अलग। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक असली धोखाधड़ी के मामले अब जीएसटी कानून की बजाय भारतीय न्याय संहिता के तहत चलेंगे। पीटीआई के सूत्रों का कहना है कि कर अधिकारियों के पास गिरफ्तारी की शक्ति नहीं रहेगी और कोई भी गिरफ्तारी अदालत की अनुमति से होगी। कौन-सी तस्वीर अंतिम होगी, यह परिषद की बैठक में ही तय होगा।

अब आगे क्या होगा

परिषद में फैसला होता है तो केंद्र संसद के शीतकालीन सत्र में जीएसटी कानून में संशोधन ला सकता है। केंद्र और राज्यों के बीच आठ-नौ महीनों से चले परामर्श के बाद अब गेंद परिषद के पाले में है। निगरानी लायक यह भी रहेगा कि सोना, चांदी और प्लैटिनम आयात पर बैंकों को मिल रही आईजीएसटी छूट वापस लेने का प्रस्ताव परिषद कितनी गंभीरता से लेती है।

कल की बैठक के बाद ही पता चलेगा कि परिषद ने किस प्रस्ताव पर मुहर लगाई और किसे टाल दिया। कानून बदलने के लिए विधायी प्रक्रिया जरूरी होगी, यानी राहत की खबर आते ही व्यवस्था नहीं बदलेगी — संशोधन संसद से पारित होने के बाद ही असर में आएगा।

Questions people ask

क्या जीएसटी में गिरफ्तारी पूरी तरह खत्म हो जाएगी?
प्रस्ताव कर अधिकारियों की गिरफ्तारी की शक्ति हटाने का है, टैक्स वसूली की नहीं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक असली धोखाधड़ी के मामलों में भारतीय न्याय संहिता के तहत कार्रवाई होगी। पीटीआई के सूत्रों का कहना है कि गिरफ्तारी के लिए अदालत की अनुमति जरूरी होगी। कर, ब्याज और जुर्माने की वसूली जारी रहेगी।
अभियोजन सीमा ₹5 करोड़ होने से किसे फायदा होगा?
₹1 करोड़ से ₹5 करोड़ तक के मामलों में आपराधिक मुकदमा नहीं चलेगा। वर्गीकरण, मूल्यांकन और आईटीसी जैसे रोजमर्रा के विवाद आपराधिक प्रक्रिया से बाहर रहेंगे। इससे छोटे और मझोले कारोबारियों पर मुकदमे का डर कम होगा। जानबूझकर की गई बड़ी धोखाधड़ी पर कार्रवाई जारी रहेगी।
ईमानदार खरीदार का आईटीसी कब सुरक्षित रहेगा?
अगर आपके पास वैध चालान है और आपने सप्लायर को भुगतान किया है, तो श्रृंखला में ऊपर का सप्लायर डिफॉल्ट करे तब भी आपका क्रेडिट बचा रहेगा। वसूली डिफॉल्टर सप्लायर से होगी। लेकिन अगर आप जानबूझकर धोखाधड़ी में शामिल पाए गए, तो यह छूट नहीं मिलेगी।
बैठक में फैसला होने के बाद कानून कब बदलेगा?
परिषद में सहमति बनी तो केंद्र संसद के शीतकालीन सत्र में जीएसटी कानून में संशोधन ला सकता है। कानून बदलने के लिए विधायी प्रक्रिया जरूरी है। परिषद का फैसला नीति की दिशा तय करेगा, लेकिन गिरफ्तारी की धाराएं संसद से संशोधन पारित होने के बाद ही हटेंगी।

Sources

  1. LatestLY — No More Arrests Under GST? (Indian Express रिपोर्ट) (latestly.com)
  2. APNA MA TV — GST Council likely to remove arrest provisions (ANI) (apnamatvchannel.com)
  3. 10BM News — GST Council meeting on October 7: arrest powers, ITC, prosecution threshold (PTI) (10bmnews.com)

Editorial Note: This explainer was researched using verified primary sources and official notifications, then independently fact-checked, reviewed, and finalized under human editorial guidance by the Gagariya desk.

This story is informational only and is not financial advice. Decisions about money belong with a registered adviser — the sources above are a good place to start reading.

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